Friday, May 22, 2020

अंजलि इला मेनन



जन्म:1940, वेस्ट बंगाल 

कार्यक्षेत्र: चित्रकारी 



अंजलि इला मेनन भारत की बेहतरीन समकालीन कलाकारों में से एक हैं। उनके द्वारा बनाये गए चित्र दुनिभर के महत्वपूर्ण संग्रहालयों में रखे हुए हैं। सन 2006 में कैलिफ़ोर्निया के 'एशियन आर्ट म्यूजियम ऑफ़ सन फ्रांसिस्को' ने उनकी एक महत्वपूर्ण रचना 'यात्रा' का अधिग्रहण किया। उनकी पेंटिंग का पसंदीदा माध्यम है तैल पर इसके अलावा वे शीशा और वाटर कलर जैसे दूसरे माध्यमों पर भी चित्रकारी करती हैं। अंजलि एक जानी-मानी भित्ति चित्रकार भी हैं। कला जगत में उनकी उपलब्धियों के लिए भारत सरकार ने सन 2000 में उन्हें पद्म श्री से सम्मानित किया। 

प्रारंभिक जीवन 

अंजलि इला मेनन का जन्म सन 1940 में बंगाल में हुआ था। उनकी प्रारंभिक शिक्षा तमिलनाडु के निलगिरी के लवडेल स्थित लॉरेंस स्कूल में हुआ। बचपन में ही उनका झुकाव चित्रकारी की ओर हो गया और 15 साल की उम्र तक वे अपने कुछ चित्र बेच भी चुकी थीं। स्कूल की शिक्षा के बाद उन्होंने मुंबई के प्रसिद्ध सर जे.जे. स्कूल ऑफ़ आर्ट में कुछ समय तक अध्ययन किया और उसके बाद दिल्ली के प्रसिद्ध मिरांडा कॉलेज में दाखिला लिया जहाँ से उन्होंने अंग्रेजी साहित्य में डिग्री प्राप्त की। इसी दौरान वे इतालवी चित्रकार मोदिग्लिअनि और भारतीय चित्रकार एम.एफ. हुसैन की कला से बहुत प्रभावित हुईं। जब वे 18 साल की थीं तब उन्होंने अपनी अलग-अलग शैली के 53 चित्रों की प्रदर्शनी लगाई। उनकी रचनात्मक प्रतिभा के परिणामस्वरूप उन्हें फ्रांस सरकार ने एक छात्रवृत्ति दी जिसके माध्यम से उन्हें विश्व प्रसिद्ध 'इकोल नेशनल सुपेरियर डे ब्यू आर्ट्स' में शिक्षा ग्रहण करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। 

भारत वापस आने से पहले उन्होंने यूरोप और पश्चिमी एशिया की यात्रा की जहाँ उन्होंने विभिन्न प्रकार की कलाओं का अध्ययन किया। 

करियर 

उनकी पहली एकल प्रदर्शनी सन 1958 में लगी थी जिसके बाद इनकी कलाकृतियों की लगभग 50 प्रदर्शनियां लग चुकी हैं। 

अंजलि मेनन की कृतियां राष्ट्रीय आधुनिक कला संग्रह, नई दिल्ली, पीबाडी एसेक्स म्यूजियम, चंडीगढ म्यूजियम, द एशियन आर्ट म्यूजियम, सैन फ्रांसिस्को और जापान के फुकुओका म्यूजियम सहित दुनिया भर के कई निजी संग्रहों में रखी गई हैं। 

वे एक प्रसिद्ध भित्ति चित्रकार भी हैं और कई समारोहों में भारत का प्रतिनिधित्व कर चुकी हैं। 

व्यक्तिगत जीवन 

अध्ययन के उपरान्त फ्रांस से लौटने के बाद अंजलि इला मेनन ने अपने बचपन के मित्र और भारतीय नौसेना के अधिकारी राजा मेनन से विवाह कर लिया। विवाह के उपरान्त उन्होंने भारत के अलावा अमेरिका, यूरोप के कई देश, जापान और पूर्व सोवियत संघ में रहकर कार्य किया है। इन देशों में उन्होंने अपने काम की 30 से भी ज्यादा एकल प्रदर्शनी आयोजित की है। 

पुरस्कार और सम्मान 

सन 2000 में भारत सरकार ने उन्हें पद्म श्री से सम्मानित किया 

उनका नाम 'लिम्का बुक ऑफ़ रिकार्ड्स' में भी दर्ज है 

सन 2013 में दिल्ली सरकार ने उन्हें 'लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड' से सम्मानित किया 

सन 2013 में भारतीय कला और संस्कृति के क्षेत्र में बेहतरीन योगदान के लिए उन्हें दयावती मोदी पुरस्कार से सम्मानित किया गया

हेमा उपाध्याय



हेमा उपाध्याय एक भारतीय कलाकार थीं. उनका जन्म 1972 में बड़ौदा, भारत में हुआ था. 1998 के बाद से मुम्बई शहर में रहीं. 11 दिसंबर 2015 में उनकी और उनके वकील की हत्या कर दी गई. 

हेमा उपाध्याय 

जन्म - Hema Hirani, changed her name to Hema Upadhyay in 1998. 

18 मई 1972 

बड़ौदा, भारत 

मृत्यु - 11 दिसंबर 2015 (43 साल) 

मुंबई, भारत 

राष्ट्रीयता - भारतीय 

शिक्षा - Completed her Bachelor's (Painting) and Master's (Printmaking) in Fine Arts from M.S. College, Baroda in 1995 and 1997 individually. 

उपाध्याय विस्थापन तथा विरह के भावों को चित्रित करने के लिए फोटोग्राफी और कलाकृतियों की स्थापना का इस्तेमाल करती थीं. 

शुरूआती कार्य 

खट्टी-मीठी यादें 

हेमा की स्वीट स्वेट मेमोरीज (खट्टी-मीठी यादें) नामक पहली एकल प्रदर्शनी का आयोजन 2001 में चेमोल्ड (जिसे अब चेमोल्ड प्रेस्कॉट रोड, मुंबई के नाम से जाना जाता है) में किया गया था. इस प्रदर्शनी में कागज पर किये गए विविध प्रकार के कार्यों को शामिल किया गया था. इन कार्यों में उन्होंने 1998 में मुंबई आने के बाद के अपने प्रवास संबंधी विचारों को पेश करने के लिए स्वयं की तस्वीरों को शामिल किया था. आत्म-चित्रण के एक लघु फोटोग्राफिक संग्रह का शामिल किया जाना हेमा के चित्रों की एक सामान्य विशेषता है. विभिन्न मुद्राओं में अपनी छवियों को छोटा करके वे उन्हें अपने रूपात्मक परिदृश्यों में समावेशित कर अपने द्वारा रचित आलंकारिक तथा काल्पनिक वातावरण के साथ मिश्रित होने का मौका प्रदान करती हैं. 

खट्टी-मीठी यादें, एक नए स्थान पर जाने के बाद स्वाभाविक तौर पर उत्पन्न होने वाली अलगाव तथा नुकसान की भावना के साथ-साथ आश्चर्य और उत्साह की भावना को भी सुंदर तरीके से चित्रित करती है. कागज पर किये गए विविध प्रकार के कार्यों की यह प्रदर्शनी उनके एक पड़ोसी की आत्महत्या तथा उनके द्वारा एक ऐसे शहरी क्षेत्र में रहने के कारण उत्पन्न होने वाले भ्रम से प्रेरित थी, जहां स्वप्नों तथा आकांक्षाओं हवा देने के साथ-साथ बड़ी बेरहमी से कुचल भी दिया जाता है. इस प्रदर्शनी का प्रमुख चित्र इन भावनाओं को बेहद सुंदर तरीके से चित्रित करता है. यह एक चौड़े और मुस्कराते हुए मुख का एक करीबी चित्र (क्लोज अप) है जो सर्वव्यापी सड़न तथा पतन को दर्शाता है. 

अन्य कार्य 

2001 में हेमा की प्रथम एकल अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शनी आर्टस्पेस, सिडनी तथा इंस्टीट्यूट ऑफ मॉडर्न आर्ट, ब्रिस्बेन, ऑस्ट्रेलिया में आयोजित की गयी जिसमे उन्होंने दी निम्फ एंड दी एडल्ट (इसे नई दिल्ली में आयोजित होने वाले दसवें इंटरनेशनल ट्राईएनियल - इंडिया में भी प्रदर्शित किया गया था) नामक एक कलाकृति को प्रदर्शित किया; उन्होंने एकदम जीवंत लगने वाले 2000 कॉकरोच (तिलचट्टे) को हाथ से बनाया और अपने दर्शकों की घृणा तथा आकर्षण प्राप्त करने के लिए उन्हें पूरी गैलरी में छोड़ दिया. इस कार्य की मंशा दर्शकों को सैन्य गतिविधियों के परिणामों के बारे में सोचने हेतु प्रेरित करना था. 

द निम्फ और द अडल्ट, इन्सटॉलेशन, 2001, आर्टस्पेस, सिडनी, ऑस्ट्रेलिया 

2003 में उन्होंने मेड इन चाइना नामक एक सहयोगात्मक कार्य किया जिसमे बड़े पैमाने पर उवभोक्तावद , वैश्वीकरण तथा इनके कारण लुप्त होती पहचान के बारे में बताया गया था. उनका अगला सहयोगात्मक कार्य 2006 में अपनी मां बीना हीरानी के साथ मिलकर किया गया था; इस कार्य का शीर्षक था मम-माई (mum-my) और इसे शिकागो सांस्कृतिक केन्द्र में प्रदर्शित किया गया.

मंजीत बावा




मनजीत बावा (28 जुलाई 1940 - 29 दिसम्बर 2008) का जन्म भारत में, पंजाब के एक गांव ढुरी में हुआ। दिल्ली के कालेज ऑफ आर्ट्स और लंदन स्कूल ऑफ प्रिंटिंग से शिक्षा प्राप्त बावा पहले ऐसे कलाकार थे, जिन्होंने पाश्चात्य कला में बहुलता रखने वाले धूसर और भूरे रंग के वर्चस्व को तोड़कर चटक भारतीय रंगों (बैंगनी और लाल) को प्रमुखता दी। बांसुरी और गायों के प्रति बावा का आकर्षण बचपन से ही था, जो आजीवन साथ रहा। देशज रंगों और रूपाकारों के कुशल चितेरे बावा की कृतियों में ये आकर्षण विद्यमान है। लाल रंग उन्हें बेहद प्रिय था। वे नीले आकाश को भी लाल रंग से उकेरना चाहते थे। विलक्षण रंग प्रयोग की विशेषता के बावजूद सीमित रंगों का प्रयोग और व्यापक रंगानुभव, सूफीयना तबीयत के कलाकार बावा के कला संसार की पहचान है। 

कला समीक्षक उमा नायर के अनुसार बावा, कला में नव आंदोलन का हिस्सा थे। रंगों की उनकी समझ अद्भुत थी।उन्होंने भारतीय समकालीन कला को अंतरराष्ट्रीय मंच पर ख्याति दिलाने का जो काम किया है, उसे कला जगत में हमेशा याद किया जाएगा। 

जब वे दिल्ली में रहते हुए कला की शिक्षा ले रहे थे तब उनके गुरु थे सोमनाथ होर और बी सी सान्याल , लेकिन उन्होंने अपनी पहचान बनाई अबानी सेन की छत्रछाया में। श्री सेन ने उनसे कहा था कि रोज पचास स्कैच बनाओ। मनजीत बावा रोज पचास स्कैच बनाते और उनके गुरु इनमें से अधिकांश को रद्द कर देते थे। यहीं से मनजीत बावा के रेखांकन का अभ्यास शुरू हुआ। उन्होंने अपने उन दिनों को याद करते हुए कहीं कहा भी था कि तब से मेरी लगातार काम करने की आदत पड़ गई। जब सब अमूर्त की ओर जा रहे थे मेरे गुरुओं ने मुझे आकृतिमूलकता का मर्म समझाया और उस ओर जाने के लिए प्रेरित किया। वे आकृतिमूलकता की ओर आए तो सही लेकिन अपनी नितांत कल्पनाशील मौलिकता से उन्होंने नए आकार खोजे, अपनी खास तरह की रंग योजना का आविष्कार किया और मिथकीय संसार में अपने विषय ढूँढ़े। यही कारण है कि उनके चित्र संसार में ठेठ भारतीयता के रंग व आकार देखे जा सकते हैं। वहाँ हीर-राँझा, कृष्ण, गोवर्धन, देवी तथा कई मिथकीय और पौराणिक प्रसंग-संदर्भ और हैं। इसके साथ ही उनके चित्रों में जितने जीव-जंतु हैं उतने शायद किसी अन्य भारतीय कलाकार में नहीं। 

70 के दशक में स्व. जगदीश स्वामीनाथन के संपर्क में आकर मनजीत की कला में बड़ा फर्क आया था। भारतीय मिनिएचर कला से उन्हें बहुत कुछ सीखने का मौका मिला। पहाड़ी मिनिएचर और सिख मिनिएचर से उनका गहरा और सार्थक संवाद था। मनजीत चटक रंगों के विशेषज्ञ थे। लाल रंग खासतौर से उनकी कृतियों में सबसे ज्यादा बोलता है। सरल सूफियाना, काव्यात्मक छवियों को वह अद्भुत रूप दे देते थे। अपने स्टूडियो में मनजीत एक दिव्य आध्यात्मिक उपस्थिति थे। 

भारत भवन भोपाल में रूपंकर कला निदेशक रहे मंजीत बावा को रूपंकर कलाओं में दिए गए योगदान के लिए कालिदास सम्मान प्रदान किया गया था।

तैयब मेहता



पूरा नाम -तैयब मेहता 

जन्म - 26 जुलाई 1925 

जन्म भूमि-  गुजरात, ज़िला खेडा

मृत्यु - 2 जुलाई 2009

पत्नी - सकीना

संतान - पुत्र युसूफ और पुत्री हिमानी

कर्म भूमि -  भारत

कर्म-क्षेत्र - चित्रकला

पुरस्कार/उपाधि - पद्म भूषण

नागरिकता - भारतीय

अन्य जानकारी - सन 2002 में क्रिस्टी की नीलामी में जब उनकी एक पेंटिंग ‘सेलिब्रेशन’ लगभग 1.5 करोड़ रुपये में बिकी तब उस समय किसी भी भारतीय चित्रकार की यह सबसे महंगी पेंटिंग थी।

तैयब मेहता एक जाने-माने भारतीय चित्रकार थे। वे प्रसिद्ध ‘बॉम्बे प्रोग्रेसिव आर्टिस्ट्स ग्रुप’ के सदस्य थे। इस समूह में एफ.एन. सौज़ा, एस एच रज़ा और एम एफ हुसैन जैसे महान कलाकार भी शामिल थे। वे स्वतंत्रता के बाद की पीढ़ी के उन चित्रकारों में से थे जो राष्ट्रवादी बंगाल स्कूल ऑफ़ आर्ट के परंपरा से हटकर एक आधुनिक विधा में कार्य करना चाहते थे। उनके जीवन के अंतिम दशक में उनकी बनायीं हुई पेंटिंग्स रिकॉर्ड कीमतों पर बिकीं जिसमें उनके मृत्यु के बाद बिकी एक पेंटिंग भी शामिल है जो दिसंबर 2014 में 17 करोड़ रुपये से ज्यादा कीमत पर बेची गयी। इससे पहले भी मेहता की एक पेंटिंग ‘गर्ल इन लव’ लगभग 4.5 करोड़ रुपये में बिकी थी। सन 2002 में उनकी एक पेंटिंग ‘सेलिब्रेशन’ लगभग 1.5 करोड़ रुपये में बिकी थी जो अन्तराष्ट्रीय स्तर पर उस समय तक की सबसे महंगी भारतीय पेंटिंग थी।

आज भारतीय कला में सारी दुनिया की दिलचस्पी है और इस दिलचस्पी का एक बड़ा श्रेय तैयब मेहता को भी जाता है। जब क्रिस्टी जैसी कलादीर्घा ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर उनकी कृतियों की नीलामी की तो भारतीय कला के लिए ये एक बड़ी बात थी। समकालीन भारतीय कला इतिहास में तैयब मेहता ही अकेले पेंटर थे जिनका काम इतने कीमतों में बिका।

जीवन परिचय
तैयब मेहता का जन्म  गुजरात  के खेड़ा जिले में हुआ था। उनका पालन-पोषण मुम्बई के क्रावफोर्ड मार्केट में दावूदी बोहरा समुदाय में हुआ था। सन 1947 में उन्होंने विभाजन के बाद हुए दंगों में मुम्बई के मोहम्मद अली रोड पर एक व्यक्ति को पत्थर से मारे जाने की हृदय विदारक घटना देखी थी। इस घटना ने उनको इतना प्रभावित किया कि उनके कामों में इसकी झलक कहीं न कहीं हमें दिख ही जाती है।

तैयब मेहता ने प्रारंभ में कुछ समय के लिए मुंबई स्थित एक नामी फिल्म स्टूडियो ‘फेमस स्टूडियोज’ के लैब में फिल्म एडिटर का कार्य किया। बाद में उन्होंने मुम्बई के सर जे.जे. स्कूल ऑफ़ आर्ट्स में दाखिला लिया और सन 1952 में यहाँ से डिप्लोमा ग्रहण किया। इसके बाद वे ‘बॉम्बे प्रोग्रेसिव आर्टिस्ट्स ग्रुप’ के सदस्य बन गए। यह ग्रुप पश्चिम के आधुनिकतावादी शैली से प्रभावित था और तैयब के साथ-साथ उसमें एफ.एन. सौज़ा, एस एच रज़ा और एम एफ हुसैन जैसे महान कलाकार भी शामिल थे।

अतुल डोडिया





 (जन्म 1959, घाटकोपर , मुम्बई, भारत में) एक भारतीय कलाकार हैं। 

जीवनी 

अतुल ने 1980 के शुरुआती दिनों में मुंबई के सर जे स्कूल ऑफ आर्ट से स्नातक की पढ़ाई के बाद अपने काम का प्रदर्शन और बिक्री शुरू की, जहाँ उन्होंने BFA डिग्री प्राप्त की। उन्होंने 1991 में 1992 तक पेरिस में अपना शैक्षणिक प्रशिक्षण फ्रेंच सरकार द्वारा प्रदान की गई छात्रवृत्ति के बाद दिया । 

अतुल भारत में कई एकल शो कर चुके हैं और 'रिफ्लेक्शन्स एंड इमेजेज' वाडेहरा आर्ट गैलरी, नई दिल्ली और मुंबई, 1993 और 'ट्रेंड्स एंड इमेजेज' CIMA, कलकत्ता, 1993 में प्रदर्शित हैं। भारत के बाहर, उन्होंने गैलरी अपुन्टो, एम्स्टर्डम में प्रदर्शन किया है। 1993, 1986-89 में 'द रिचनेस ऑफ द स्पिरिट' कुवैत और रोम में भाग लिया, 'भारत - समकालीन कला' वर्ल्ड ट्रेड सेंटर, एम्सटर्डम 1989, 'एक्सपोज़र कलेक्टिव' का हवाला देहात कला, पेरिस 1992। अतुल जोडिया ने एक के रूप में प्रतिनिधित्व किया। इंडिया मंडप, वेनिस बिएनले 2019 के कलाकारों ने 2002 में महात्मा गांधी के दर्शन से प्रेरित "ब्रोकन ब्रांच" शीर्षक से एक इंस्टॉलेशन प्रदर्शित किया। उन्हें  1995 में संस्कृत पुरस्कार, नई दिल्ली दिया गया। हाल ही में एक पेंटिंग,"द वॉल" नाम की नीलामी में 57.6 लाख रुपये मिले। 

अतुल डोडिया ने साथी चित्रकार अंजू डोडिया से शादी की है और मुंबई में रहते हैं और काम करते हैं। 

एकल प्रदर्शनियों 

2010 मालेविच मैटर्स एंड अदर शटर्स , वाडेहरा आर्ट गैलरी, नई दिल्ली 

2008 पैले पूर्वजों , बोधि कला, मुंबई 

2007 वाडेहरा आर्ट गैलरी, नई दिल्ली संग्रहालय गैलरी, मुंबई केमॉल्ड प्रेस्कॉट, मुंबई 

2006 सुमुख गैलरी, बैंगलोर सिंगापुर; टायलर प्रिंट इंस्टीट्यूट, सिंगापुर; बोधि आर्ट, नई दिल्ली, मुंबई, न्यूयॉर्क 

2005 ललित कला संकाय, वडोदरा; बोस पैकिया, न्यूयॉर्क 

2004 ललित कला संकाय, वडोदरा 

2003 बोस पैकिया, न्यूयॉर्क 

2002 वाल्श गैलरी, शिकागो; साक्षी गैलरी, बॉम्बे; रीना सोफिया संग्रहालय, मैड्रिड 

2001 द फाइन आर्ट रिसोर्स, बर्लिन; जापान फाउंडेशन एशिया सेंटर, टोक्यो; गैलरी चेमॉल्ड, बॉम्बे 

1999 वाडेहरा आर्ट गैलरी, नई दिल्ली; गैलरी चेमॉल्ड, बॉम्बे 

1997 सीमा गैलरी, कलकत्ता 

1989 91, 95,97, गैलरी चेमॉल्ड, बॉम्बे 

पुरस्कार 

2008 - रज़ा अवार्ड, रज़ा फ़ाउंडेशन 

1999 - Civitella Ranieri Foundation फैलोशिप, इटली 

1999 -  सोथबी का पुरस्कार 

1995 - संस्कृतिक पुरस्कार 

1982 -  महाराष्ट्र स्वर्ण पदक

अर्पणा कौर




अर्पणा कौर एक प्रमुख भारतीय चित्रकार और ग्राफिक कलाकार हैं। 

                        अर्पणा कौर

राष्ट्रीयता - भारतीय
जाना जाता है - चित्रकारी
अजीत कौर - (मां)

वह एक सिख परिवार से आती हैं, जो ब्रिटिश भारत के विभाजन पर भ्रम की स्थिति के दौरान 1947 में पश्चिम पंजाब भाग गए थे । उनकी मां अजीत कौर (1934 में पैदा हुई), एक लेखक हैं, जो पंजाबी में लिखती हैं । कोर या कौर (उच्चारण कोर) एक धार्मिक उपनाम है जो सभी महिला सिखों द्वारा प्रयोग किया जाता है। 
उनके जन्म के बाद से उनका पहला नाम अर्पणा नहीं था, लेकिन उन्होंने पंद्रह साल की उम्र में इसे व्यक्तिगत विकास प्रक्रिया की अभिव्यक्ति के रूप में अपनाया । 

प्रारंभिक जीवन और शिक्षा

अर्पणा कौर का जन्म 1954 में दिल्ली में हुआ था। कला, संगीत और साहित्य के लिए उनका प्रदर्शन उनके जीवन में जल्दी हुआ। उन्होंने सितार सीखा, कविता लिखी लेकिन सबसे ज्यादा पेंटिंग करने में मजा आया। नौ साल की उम्र में, उन्होंने अमृता शेरगिल के कामों से प्रेरित होकर अपनी पहली ऑयल पेंटिंग 'मदर एंड डॉटर' बनाई । अर्पणा से स्नातक की उपाधि दिल्ली विश्वविद्यालय एक साथ MA साहित्य में डिग्री। चित्रकला में उसे कभी औपचारिक प्रशिक्षण नहीं मिला, और उन्होंने काफी हद तक स्वयं सीखा। वह 1982 में इसे पूरा करते हुए नई दिल्ली के गढ़ी स्टूडियो में नक्कासी तकनीक का प्रशिक्षण प्राप्त करने के लिए आगे बढ़ी ।

प्रभाव और शैली
अर्पणा कौर के चित्रों को उनके आसपास की घटनाओं और स्थितियों द्वारा आकार दिया गया था। उसकी माँ का उसके कार्यों में उसका गहरा प्रभाव; जहां 'महिला' अक्सर केंद्रीय ध्यान केंद्रित करती है। उनकी रचनाएँ पहाड़ी लघुचित्र (पहाड़ी-चित्र), पंजाबी साहित्य और भारतीय लोक कला से भी प्रेरित हैं ।

'आध्यात्मिकता', और 'समय' उसके कार्यों में आवर्ती विषय हैं।

1990 के दशक में, कौर ने वर्ली और गोडाना के स्वदेशी जातीय समूहों से भारतीय लोक कलाकारों के साथ सहयोग की एक श्रृंखला बनाई , जो भारत के बिहार राज्य के मधुबनी क्षेत्र में रहते थे । वह उन पहली समकालीन कलाकारों में से एक हैं जिन्होंने लोक कलाकारों का सहयोग किया है।

1994 में उन्हें आधुनिक कला के हिरोशिमा संग्रहालय द्वारा बमबारी की 50 वीं वर्षगांठ के अवसर पर एक भित्ति बनाने के लिए एक बड़ा काम सौंपा गया था।

समूह प्रदर्शनियां

1988 ग्रेवन इमेजेज 

1988 नुमाइश लैत कला

1992 क्रॉसिंग ब्लैक वाटर्स

1995 इनसाइड आउट: समकालीन महिला कलाकार भारत की , मिडिल्सब्रा

समीक्षा, लेख ग्रंथ 
एडी चैम्बर्स, ' इनसाइड आउट: समकालीन महिला कलाकार भारत ' , कला मासिक नंबर 193, (फरवरी1996)

पुरस्कार और सम्मान 
ऑल इंडिया फाइन आर्ट्स सोसाइटी अवार्ड, 1985

6 वें भारत त्रिवेणी 1986 में स्वर्ण पदक (ललित कला अकादमी द्वारा सम्मानित)

संग्रह 

विक्टोरिया और अल्बर्ट संग्रहालय लंदन

रॉकफेलर संग्रह, न्यूयॉर्क

समकालीन कला का संग्रहालय, लॉस एंजिल्स

सिंगापुर कला संग्रहालय, सिंगापुर

नेशनल गैलरी ऑफ़ मॉडर्न आर्ट, नई दिल्ली

अनीता दुबे


        

       अनीता दुबे का जन्म 28 नवंबर 1958 को लखनऊ उत्तरप्रदेश , भारत में चिकित्सकों के परिवार में हुआ था।
उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से इतिहास में बी.ए. पूरा किया। उन्होंने महाराजा सयाजीराव विश्वविद्यालय से कला आलोचना में अपना एमएफए पूरा किया , जो उस विश्वविद्यालय के ललित कला संकाय में विशेष रूप से उत्पादक और प्रभावशाली अवधि के दौरान था। । 

जब 1989 में केपी कृष्णकुमार की मृत्यु के बाद इंडियन रेडिकल पेंटर्स एंड स्कल्पर्स एसोसिएशन का विघटन हो गया, तो दुबे ने अपना ध्यान लेखन और आलोचना से हटकर दृश्य कला बनाने में लगा दिया, जिसमें एक सौंदर्यवादी मुहावरा विकसित हो रहा था जिसमें वस्तुओं और औद्योगिक सामग्रियों, शब्द-क्रीड़ा और फोटोग्राफी का इस्तेमाल किया गया था। भारत और उसके बाहर मौजूदा सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियों का निरंतर विश्लेषण और समालोचना प्रस्तुत करना। फिलिप वर्गेन, 2003 के एक निबंध में लिखते हैं कि ड्यूब का काम "व्यक्तिगत और सामाजिक यादों, इतिहास, पुराणों और घटना संबंधी अनुभवों के सांस्कृतिक वाहक के रूप में विशेषाधिकार मूर्तिकला।" 

दूबे की भाषा-आधारित मूर्तिकला विशेष रूप से उल्लेखनीय है। उसने कहा है कि वह "एक शब्द वास्तुकला कैसे बन सकता है" में रुचि रखती है। 

पांच अलग-अलग टुकड़ों से मिलकर, 5 शब्द भयावह क्रॉस-सांस्कृतिक शब्दार्थों और पांच मूल्य-युक्त शब्दों की मूर्तिकला की संभावनाओं की पड़ताल करते हैं, जो डब्ल्यू अक्षर से शुरू होते हैं। काम का एक और निकाय जिसे ड्यूब के लिए जाना जाता है, जिसमें चिपकने वाला, औद्योगिक रूप से समर्थित का उपयोग शामिल है। उत्पादित चीनी मिट्टी की आंखें आमतौर पर हिन्दू धार्मिक छवियों से जुड़ी होती हैं । इस तरह के काम का एक उदाहरण द स्लीप ऑफ रीजन क्रिएशन मॉन्स्टर्स है। पहली बार फिनलैंड के हेलसिंकी में कश्यम संग्रहालय के समकालीन संग्रहालय में स्थापित किया गया , जो 1789 और 1798 के बीच निर्मित फ्रांसिस्को गोये के प्रसिद्ध सेट एक्वाटिंट प्रिंट, लॉस कैप्चरिक का संदर्भ देता है। 

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर, उसका काम गद्दा फैक्टरी , पिट्सबर्ग में प्रदर्शित किया गया है। 

1997 में, दूबे ने खोज को नई दिल्ली में एक अंतर्राष्ट्रीय कलाकार संघ के रूप में प्रदर्शित किया। एक अपेक्षाकृत मामूली वार्षिक कार्यशाला के रूप में शुरू किया गया जो वैश्विक कार्यशालाओं, निवासों और प्रदर्शनियों के आयोजन के लिए एक वैश्विक संदर्भ में दक्षिण एशियाई कला का एक प्रमुख मंच बन गया है।