Sunday, May 3, 2020

रवींद्रनाथ टैगोर

 रविंद्रनाथ टैगोर 

जन्म
07 मई 1861 
कलकत्ता (अब कोलकाता) ब्रिटिश भारत

मृत्यु
07 अगस्त 1941
कलकत्ता, ब्रिटिश भारत

व्यवसाय
लेखक कवि, नाटककार, संगीतकार, चित्रकार

भाषा-
बंगला, अंग्रेजी साहित्यिक 

आन्दोलन- 
आधुनिकतावाद

उल्लेखनीय कार्य-
गीता , गोरा, घरे बाइरे,  जान गण मन , रबिन्द्र संगीत,  आमार सोनार बांग्ला, नौका डूबी 

उल्लेखनीय सम्मान - 
साहित्य के लिए नोबल पुरस्कार

जीवनसाथी -
मृणालिनी देवी (1 मार्च 1874–23 नवंबर 1902) 
सन्तान- 
5 (जिनमें से दो का बाल्यावस्था में निधन हो गया) 
सम्बन्ध-
टैगोर परिवार


     रविंद्रनाथ टैगोर ने विद्यार्थी काल में कोई कला शिक्षा प्राप्त नहीं की थी असाधारण काव्य की संवेदन क्षमता इनकी कला के साधन थे। वह अज्ञात आंतरिक सृजन शक्ति का विश्वास करते हुए उनको सिद्धांत चर्चा का विषय बनाने के विरोधी थे। उनका मानना था कि कला का कार्यात्मक काम की दृष्टि से विचार नहीं करना चाहिए। कला पूरी तरह से सहज ज्ञान व अंतर्मन की क्रियाओं पर निर्भर है। लय कला की आत्मा है एवं उसकी सहज सिद्धि अनुभूति कला निर्मित की प्राथमिक आवश्यकता है। 
     अपनी आयु के 67वें साल तक रविंद्रनाथ ने चित्रकला की दिशा में कोई विशेष प्रयत्न नहीं किया था।
 वह विश्व विख्यात कवि बन चुके थे। और उनकी प्रतिभा काव्य निर्मिति में व्यस्त थी। कविता लिखते समय शब्दों या पंक्तियों को रेखाओं से मिटाने पर जो अकल्पित आकार बन जाते थे, उनकी ओर ध्यान जाने पर वह कुछ दृश्य कल्पना में खो जाते थे। 1928 में स्वयंसिद्ध कारणों से वे इतने मोहित हुए कि जिस कविता को लिखते समय  वे आकार प्रकट हुए थे, उनका अस्तित्व ही वे भूल गए एवं आकारों के विकास पर उन्होंने ध्यान केंद्रित किया। और रविंद्रनाथ की अति यथार्थवादी कला का प्रारंभ हुआ। भारतीय कला के इतिहास में यह अभूतपूर्व प्रयोग था। आरंभ में उन्होंने केवल फाउंटेन पेन से रेखांकन करके कला का निर्माण किया। जिनमें काल्पनिक पक्षी या जानवर जैसे आकार प्रचुर मात्रा में दिखाई पड़ते हैं।
     1929 के करीब उन्होंने कपड़े के टुकड़ों या उंगलियों को स्याही में डुबोकर दो या तीन छटा में चित्र शुरू किया एवं उसके पश्चात सीमित रंगों का उपयोग भी शुरू किया।               
 शुरुआत में रवींद्रनाथ नाथ ने अपने चित्रण को फुर्सत में किया गया खेलक्रीड़ा मात्र समझा, किंतु शीघ्र ही वह अनुभव करने लगे की पांडुलिपि में किए रेखांकन से निर्मित आकारों में गूढ़ आत्माएं निवास करती है, जो पापी लोगों के समान मुक्ति पाने के लिए आक्रोश कर रही हैं । और उन को अंतिम रूप देकर मुक्त करने को वे स्वयं तड़प रहे हैं। इस प्रकार रवींद्रनाथ ने आंतरिक जीवन की प्रेरणा को तीव्रता से अनुभव किया। उन्होंने तन्मय होकर कला निर्मित शुरू की। 
    1930 में रविंद्र नाथ के चित्रों की प्रदर्शनी पेरिस में गैलरी पिगल मे हुई जिसकी यूरोपीय कलाकारों व समीक्षकों ने बहुत प्रशंसा की व भारत में लोगों को आश्चर्य हुआ कि रवींद्रनाथ न केवल महाकवि हैं बल्कि एक श्रेष्ठ कलाकार भी हैं। उसी   साल उनके कुछ चित्र लंदन, बर्लिन, न्यूयॉर्क में प्रदर्शित किए गए। 
  1932 में उनके चित्रों की प्रदर्शनी कोलकाता में हुई  दूसरे साल मुंबई में हुई। 1946 में यूनेस्को द्वारा आयोजित अंतरराष्ट्रीय आधुनिक कला प्रदर्शनी में उनके चार चित्र सम्मिलित किए गए। रविंद्रनाथ के अधिकतर चित्र ऐसे हैं कि वे क्षणिक सर्जन प्रेरणा द्वारा बिना पूर्व विचार के बनाए गए हैं।उनमें परिवर्तन या उद्देश्य पूर्ण प्रतिपादन के प्रयत्न नहीं है चित्रण को आरंभ करते ही विभिन्न विश्राम या चिंतन से दूर होकर उनको शीघ्रता से पूर्ण करते। उन्होंने  सब प्रकार के रंगों पेस्टल, ड्राई पॉइंट और एचिंग का प्रयोग किया। किंतु वे तरल मिश्रित रंगों का अधिक प्रयोग करते थे और सुलभता से प्राप्त स्याही का भी काफी मात्रा में उपयोग करते थे। रंग नहीं मिलने पर भी कभी फूलों की पंखुड़ियों उसको दबाकर रंगों के स्थान पर काम में लाते । उन्होंने तूलिका का शायद ही कभी उपयोग किया होगा। ऐसे समय भी उनकी अपने घर पर बनाई तूलिका थी। तूलिका से वे कपड़े की टुकड़ों या उंगलियों से रंग करना पसंद करते थे। इन सब बातों से स्पष्ट है की वह रंगा रंगांकन पद्धति सामग्री या कला अध्ययन से आंतरिक प्रेरणा को अधिक महत्व देते।

 रवींद्रनाथ की कला ने विभिन्न प्रकार की अनुभूतियों को साकार किया है। थके हुए यात्री, मां व बच्चा, सफेद धागे जैसे चित्रों में मानव जीवन का व्यापक दार्शनिक विचार है। दृश्य चित्र प्रकृति की रमणीयता से ओतप्रोत हैं। सहज रेखाओं द्वारा निर्मित काल्पनिक प्राणियों में आंतरिक जीवन का अद्भुत संचार व माननीय किंतु नैसर्गिक भावनाओं का दर्शन है कुमार स्वामी ने रवींद्रनाथ की कला के बारे में लिखा है, "उनकी मौलिक शहर चित्र अभिव्यक्ति असामान्य नित्य युवती प्रतिभा का प्रमाण है"।

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