Sunday, May 3, 2020

यामिनी राय

यामिनी राय

जन्म: 11 अप्रैल, 1887, बांकुड़ा ज़िला, पश्चिम बंगाल
मृत्यु: 24 अप्रैल, 1972, कोलकाता
कार्यक्षेत्र: चित्रकारी
विद्यालय: ‘गवर्नमेंट स्कूल ऑफ़ आर्ट्स’, कोलकाता
पुरस्कार/उपाधि: ‘वायसरॉय का स्वर्ण पदक’ (1935), ‘पद्म भूषण’ (1955)




यामिनी राय का जन्म 1883 में पश्चिमी बंगाल के बांकुड़ा जिले में हुआ। इस जिले में संथाल लोगों की बस्तियां थी। और पट चित्रण काफी प्रचलित था। दोनों बातों का यामिनी राय की भविष्य की कला पर काफी प्रभाव पड़ा। 



1903 मैं यामिनी राय ने कोलकाता कला विद्यालय में अध्ययन शुरू किया इस समय वहां नैसर्गिकतावादी एवं पुनरुत्थान शैली का प्रभाव था। आरंभ में उन्होंने व्यक्ति चित्रण करके पैसा कमाना शुरू किया किंतु उससे भी असंतुष्ट थे। 1925 से उन्होंने कालीघाट शैली के अनुसार स्पष्ट रेखा व चमकीले रंगों में चित्रण शुरू किया। जिसका उनका चित्र 'संथाल लड़की, 1925 आरंभिक उदाहरण है। धीरे-धीरे उनकी रेखा अधिक  निर्भीक लयबद्ध व सामर्थ्यवान रंगसंगती अधिक तेज और आकर्षक बन गई।


यामिनी राय को बंगाल के पट चित्रों ने अत्यधिक प्रभावित किया इन्होंने 1937 में  ईशा के जीवन को चित्रित करना प्रारंभ कर दिया। उनकी कला में ना विदेशी पन है न ठाकुर शैली की धूमिल नैराश्य भावना। बंगाल के लोक कला के अनुशीलन से उन्होंने एक सर्वथा मौलिक शैली की उद्भावना की। यामिनी राय को पिकासो कहा जाता है किंतु यह अतिसयोक्ति है। पाश्चात्य कला समीक्षकों ने उन्हें भारतीय कला का पैगंबर कहा है। यामिनी राय के चित्रों की तुलना प्रायः चाइल्ड आर्ट से की जाती है, क्योंकि उनके चित्रों में वही बाल सुलभ चंचलता, सरलता तथा चटक रंगों के प्रति लगाव है, जो एक बालक के चित्रों में होता है। इनकी प्रसिद्ध कृतियों में राधा कृष्ण और बलराम, गणेश और पार्वती, ईशा व शिष्य, नर्तकी, रामायण का एक दृश्य, 3 स्त्रियां, बिल्ली, केकड़ा, मछली, लोमड़ी  व हाथी आदि प्रमुख है।


 यामिनी राय के इन प्रयोगों की तुलना पिकासो के नीग्रो काल में किए प्रयोगों से की जा सकती है। यद्यपि बाद में गतिरोध पैदा होकर यामिनी राय की कला में कृत्रिमता आ गई। अब निजी विकसित शैली में यामिनी राय ने संथाल जातियों के जीवन को चित्रित किया।

 1937 में उन्होंने ईशा के जीवन को चित्रित करना शुरू किया वह ईशा व शिष्य, ईशा का शीर्ष आदि चित्र बनाए। उनके चित्र में पौराणिक विषयों एवं जानवरों के चित्र भी हैं।
  1940 से उनके चित्रों की विदेशों में मांग बढ़ गई उसके साथ ही उनके चित्रण में यांत्रिक कृत्रिमता आ गयी। अत्यधिक अलंकारिता के कारण यामिनी राय की कला सर्जनशील की अपेक्षा  चित्त आकर्षक तथा अभिव्यक्ति में कमजोर बन गई।

जामिनी रॉय का नाम भारत के महान चित्रकारों में गिना जाता है। वे 20वीं शताब्दी के महत्‍वपूर्ण आधुनिकतावादी कलाकारों में से थे, जिन्‍होंने अपने समय की कला परम्‍पराओं से अलग एक नई शैली स्‍थापित करने में अहम् भूमिका निभाई। वे महान चित्रकार अबनिन्द्रनाथ टैगोर के सबसे प्रसिद्ध शिष्यों में एक थे।
सन 1938 में उनकी कला की प्रदर्शनी पहली बार कोलकाता के ‘ब्रिटिश इंडिया स्ट्रीट’ पर लगायी गयी। 1940 के दशक में वे बंगाली मध्यम वर्ग और यूरोपिय समुदाय में बहुत मशहूर हो गए। सन 1946 में उनके कला की प्रदर्शनी लन्दन में आयोजित की गयी और उसके बाद सन 1953 में न्यू यॉर्क सिटी में भी उनकी कला प्रदर्शित की गयी। सन 1954 में भारत साकार ने उन्हें पद्म भूषण से सम्मानित किया।

इस महान चित्रकार का निधन 24 अप्रैल, 1972 को कोलकाता में हुआ। वे अपने पीछे चार पुत्र और एक पुत्री छोड़ गए। उनके परिवार की अगली पीढियां और बच्चे उनके द्वारा बनाये गए कोलकाता के ‘बल्लीगंज प्लेस’ में रहते हैं।

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