निकोलस रोरिक
जन्म से रशियन होते हुए भारतीय दर्शन संस्कृति व हिमालय के गूढ़ प्राकृतिक सौंदर्य के प्रति निकोलस रोरिक का जो असीम प्रेम था उसके कारण उनकी गणना निस्संदेह निष्ठावान भारतीयों में करनी होगी। भारतीय कला क्षेत्र में उनके श्रेष्ठता के अनुसार उनको ख्याति नहीं मिली इसके कई कारण है, वे व्यावसायिक क्षेत्र में में नहीं उतरे क्योंकि इस पर विचार करने की उनको फुर्सत नहीं थी । वे विरक्त पुरुष थे । चिरंतन आत्मिक शांति की खोज में चित्रण, लेखन व अध्ययन करते रहते जो उनके लिए अंतिम ध्येय प्राप्ति के साधन मात्र थे। उन्होंने आधुनिक कलाकारों के समान केवल कला प्रयोग करने में रूचि नहीं ली बल्कि प्राचीन मध्ययुगीन कलाकारों के समान कला को सर्वशक्तिमान सर्वव्यापी अज्ञात शक्ति की उपासना के समान माना। पहाड़ों के प्राकृतिक दृश्य चित्रण व काव्य निर्मिति में व्यस्त प्राचीन चीनी कलाकारों के समान वह सबसे साधनारत कलाकार थे, अतः वर्तमान भौतिकता वादी युग के युग के व्यावसायिक दृष्टिकोण के कलाकारों के लिए उनका अनुसरण कठिन है। लोरिक का बचपन रसिया की पुरातन संस्कृति के अवशेषों के संपन्न नोवगोराट शहर के निकट बीता । जो उनकी स्वाभाविक धार्मिक वृत्ति के पोषक रहा। उन्होंने आरंभिक कला में रशियन चित्रकार अरखीप कुइंजी से प्राप्त की। बीसवीं शताब्दी के आरंभिक काल में बनाए गए उनके चित्रों में भी चमकीली पारदर्शक रंग संगति, सायं कालीन प्रकाश का प्रभाव, आकारों का सरलीकृत ठोसपन वगैरह गुणों का आभास है, जो उनकी भविष्य की परिपक्व कला की कुछ विशेषताएं हैं।उन्होंने हिमालय के असंख्य चित्र बनाए।
कुल्लू में व्यास नदी के बाएँ किनारे प्राचीन राजधानी नग्गर तथा नग्गर किले के ऊपर है ’’रोरिक आर्ट गैलरी‘‘। नग्गर किला जो प्राचीन काष्ठ ’काठकूणी‘ शैली का एक अद्भुत उदाहरण है, अब हिमालय पर्यटन निगम का होटल है। होटल के ऊपर त्रिपुरा सुंदरी के पैगोडा शैली के मंदिर के ऊपर स्थित है यह गैलरी जिसमें रोरिक के अद्भुत चित्र उसी पुरातन घर में प्रदर्शित हैं जिस में रोरिक रहा करते थे। इस छोटे से घर में निचली मंजिल में घुसते ही आर्ट गैलरी है, जिसमें चित्र सुसज्जित हैं। ऊपर की मंजिल में रोरिक का आवास है जिसे संरक्षित किया गया है। बाहर उनकी पुरानी गाड़ी एक स्मृति के रूप में खड़ी रहती है। प्रागंण में कुछ मुर्तियों के नीचे इस कलाकार की समाधि है। रोरिक 13 दिसम्बर 1947 को यही दिवंगत हुए।
बहुमुखी प्रतिभा के धनी रोरिक न केवल एक महान चित्रकार ही थे बल्कि पुरातत्ववेत्ता, कवि, लेखक, दार्शनिक और शिक्षाविद् थे। वे हिमालय में एक इंस्टीट्यूट स्थापित करना चाहते थे। इस उद्देश्य से उन्होंने राजा मण्डी से 1926 में ’’हॉल एस्टेंट नग्गर‘‘ खरीदा।
चित्रों में देखने को मिलता है। चित्रों में धूप छांव, बर्फ से निकलती रोशनियाँ, पर्वतों का रहस्यमय आवरण, उनकी गहराई, उनका उठान और उफान, समय समय पर बदलते अद्भुत रंग और मूड, बादलों को चीर कर निकलती रोशनी की लाट, चमकते सितारे, जाते हुए पर्वत यात्री, बौद्ध भिक्षु: सब एक रहस्यमय और विचित्र संसार की रचना करते हैं।
सात हजार से अधिक चित्रों का निर्माता रोरिक के प्रसिद्ध चित्रों में टूटा तारा, दूर देश का आगत, कल्कि अवतार, दाता बुद्ध, चरक, त्रिरत्न आदि निगाए जा सकते हैं। तिब्बत शीर्षक चित्र में एक छोरतेन के पीछे तिब्बत के घर बर्फीलें पर्वतों की बेकग्राउंड में बनाए गए हैं। एक चित्र में बौद्ध भिक्षु दिखाए हैं। जो पर्वत के इस ओर नतमस्तक हो रहे हैं। एक से दो चित्र अद्भुत है। जिनमें एक तारा टूटता हुआ दिखाया है। एक चित्र ’’हिमालय‘‘ में नीचे तीन प्राचीन घर और आकाश में टूटते हुए तारे की लम्बी लकीर है जो एक चित्र में कुछ पतली है तो दूसरे में कुछ चौड़ी। ’’ओवर द पास‘‘ चित्र में यात्री पास से गुजरते हुए दिखाए गए हैं, साथ के पहाड़ पर एक मानव आकृति चित्रित हुई है। दो अन्य चित्र जो समानता लिए हुए हैं; ’मडोना‘ और ’मदर ऑफ द वर्ल्ड‘ है। मेडोना अपनी परम्परागत वेशभूषा में है तो मदर तिब्बती पोशाक में है। बर्फीले पर्वतों, उनके ऊपर नीले आकाश, बादलों से छन कर आती सूर्य किरणों के अनेकों चित्रों के साथ एक चित्र ’’द ग्रेट स्प्रिट ऑफ हिमालयाज‘‘ में एक ओर के पर्वत की सेनापति सी मुखाकृति बनाई गई है।

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