Tuesday, May 5, 2020

एम एफ हुसैन


एम एफ हुसैन


जन्म
17 सितंबर 1915
पंढरपुर

मृत्यु
9 जून 2011, 2011
लंदन

मृत्यु का कारण
हृदयाघात

नागरिकता
भारत, क़तर, ब्रिटिश राज

व्यवसाय
फ़िल्म निर्देशक, राजनीतिज्ञ, कलाकार, पटकथा लेखक, फ़िल्म निर्माता, फोटोग्राफर

धार्मिक मान्यता
इस्लाम

बच्चे
शमशाद हुसैन

पुरस्कार

पद्म भूषण, कला में पद्मश्री श्री, पद्म विभूषण


समकालीन वरिष्ठ चित्रकार मकबूल फिदा हुसैन आधुनिक भारतीय चित्रकला के स्तंभ थे। हुसैन का जन्म सोलापुर महाराष्ट्र में 1915 में हुआ था।

एमएफ़ हुसैन को पहली बार राष्ट्रीय स्तर पर पहचान 1940 के दशक के आख़िर में मिली। वर्ष 1947 में वे प्रोग्रेसिव आर्टिस्ट ग्रुप में शामिल हुए। युवा पेंटर के रूप में एमएफ़ हुसैन बंगाल स्कूल ऑफ़ आर्ट्स की राष्ट्रवादी परंपरा को तोड़कर कुछ नया करना चाहते थे। वर्ष 1952 में उनकी पेंटिग्स की प्रदर्शनी ज़्यूरिख में लगी। उसके बाद तो यूरोप और अमरीका में उनकी पेंटिग्स की ज़ोर-शोर से चर्चा शुरू हो गई। वर्ष 1966 में भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किया। वर्ष 1967 में उन्होंने अपनी पहली फ़िल्म थ्रू द आइज़ ऑफ़ अ पेंटर बनाई। ये फ़िल्म बर्लिन फ़िल्म समारोह में दिखाई गई और फ़िल्म ने गोल्डन बेयर पुरस्कार जीता।
वर्ष 1971 में साओ पावलो समारोह में उन्हें पाबलो पिकासो के साथ विशेष निमंत्रण देकर बुलाया गया था। 1973 में उन्हें पद्मभूषण से सम्मानित किया गया तो वर्ष 1986 में उन्हें राज्यसभा में मनोनीत किया गया। भारत सरकार ने वर्ष 1991 में पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया। 92 वर्ष की उम्र में उन्हें केरल सरकार ने राजा रवि वर्मा पुरस्कार दिया। क्रिस्टीज़ ऑक्शन में उनकी एक पेंटिंग 20 लाख अमरीकी डॉलर में बिकी। इसके साथ ही वे भारत के सबसे महंगे पेंटर बन गए थे।

 प्रोग्रेसिव आर्टिस्ट ग्रुप के प्रणेता हुसैन ने सिनेमा होर्डिंग्स के पेंटर के रूप में कार्य किया।  और बाद में वह खुद फिल्मों फिल्मों का निर्माण करने लगे गज गामिनी और मीनाक्षी उनकी फिल्में है। हमेशा चर्चा और विवादों में बने रहने वाले हुसैन ने ललित कला अकादमी की प्रथम राष्ट्रीय प्रदर्शनी में पहला पुरस्कार प्राप्त किया। 1967 में "थ्रू द आईज ऑफ ऐ पेंटर" नामक वृत्तचित्र बनाया जो 1968 में बर्लिन में पुरस्कृत हुआ। भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री तथा पद्म भूषण भूषण से सम्मानित किया।
बुनियादी तौर पर हुसैन प्रतीक वादी चित्रकार थे। उनकी मानव आकृतियों में एक विशेष प्रकार की विकृति उत्पन्न की गई है। 1948 के लगभग वे यथार्थवादी रहे फिर धनवाद से संपूर्ण विकृत तक तक धीरे-धीरे पहुंच गए। उन्होंने श्रृंखलाओं में चित्रों को उतारा। उनकी प्रसिद्ध कृतियों में स्वास्तिक, ढोलकिया, घोड़े, वापसी, जमीन, मदर टेरेसा, फूलन देवी, मकड़ी, बैलगाड़ी आदि उल्लेखनीय हैं।


भारतीय देवी-देवताओं पर बनाई, इनकी विवादित पेंटिंग को लेकर भारत के कई हिस्सों में उग्र प्रदर्शन हुए। शिवसेना ने इसका सबसे अधिक विरोध किया।आर्य समाज ने भी इसका कड़ा विरोध किया और आर्य समाज के एक कार्यकर्ता और हैदराबाद के हिन्दी दैनिक स्वतंत्र वार्ता के पत्रकार तेजपाल सिंह धामा  भारत माता की विवादित पेंटिंग बनाने पर एम एफ हुसैन से एक पत्रकार वार्ता के दौरान उलझ बैठे थे, बाद में 2006 में हुसैन ने हिन्दुस्तान छोड़ दिया था।और तभी से लंदन में रह रहे थे। हुसैन से उलझने वाले पत्रकार धामा को बाद में मुंबई में एक कार्यक्रम में शिवसेना संस्थापक बाल ठाकरे द्वारा इन्हें सन आफ आर्यवर्त कहकर संबोधित किया। 2010 में कतर ने हुसैन के सामने नागरिकता का प्रस्ताव रखा, जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया। 2008 में भारत माता पर बनाई पेंटिंग्स के खिलाफ दिल्ली हाईकोर्ट में चल रहे मुकदमे पर न्यायाधीश की एक टिप्पणी "एक पेंटर को इस उम्र में घर में ही रहना चाहिए" जिससे उन्हें गहरा सदमा लगा और उन्होंने इसके खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय में अपील भी की। हालांकि इसे अस्वीकार कर दिया गया था।

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