Friday, May 22, 2020

अंजलि इला मेनन



जन्म:1940, वेस्ट बंगाल 

कार्यक्षेत्र: चित्रकारी 



अंजलि इला मेनन भारत की बेहतरीन समकालीन कलाकारों में से एक हैं। उनके द्वारा बनाये गए चित्र दुनिभर के महत्वपूर्ण संग्रहालयों में रखे हुए हैं। सन 2006 में कैलिफ़ोर्निया के 'एशियन आर्ट म्यूजियम ऑफ़ सन फ्रांसिस्को' ने उनकी एक महत्वपूर्ण रचना 'यात्रा' का अधिग्रहण किया। उनकी पेंटिंग का पसंदीदा माध्यम है तैल पर इसके अलावा वे शीशा और वाटर कलर जैसे दूसरे माध्यमों पर भी चित्रकारी करती हैं। अंजलि एक जानी-मानी भित्ति चित्रकार भी हैं। कला जगत में उनकी उपलब्धियों के लिए भारत सरकार ने सन 2000 में उन्हें पद्म श्री से सम्मानित किया। 

प्रारंभिक जीवन 

अंजलि इला मेनन का जन्म सन 1940 में बंगाल में हुआ था। उनकी प्रारंभिक शिक्षा तमिलनाडु के निलगिरी के लवडेल स्थित लॉरेंस स्कूल में हुआ। बचपन में ही उनका झुकाव चित्रकारी की ओर हो गया और 15 साल की उम्र तक वे अपने कुछ चित्र बेच भी चुकी थीं। स्कूल की शिक्षा के बाद उन्होंने मुंबई के प्रसिद्ध सर जे.जे. स्कूल ऑफ़ आर्ट में कुछ समय तक अध्ययन किया और उसके बाद दिल्ली के प्रसिद्ध मिरांडा कॉलेज में दाखिला लिया जहाँ से उन्होंने अंग्रेजी साहित्य में डिग्री प्राप्त की। इसी दौरान वे इतालवी चित्रकार मोदिग्लिअनि और भारतीय चित्रकार एम.एफ. हुसैन की कला से बहुत प्रभावित हुईं। जब वे 18 साल की थीं तब उन्होंने अपनी अलग-अलग शैली के 53 चित्रों की प्रदर्शनी लगाई। उनकी रचनात्मक प्रतिभा के परिणामस्वरूप उन्हें फ्रांस सरकार ने एक छात्रवृत्ति दी जिसके माध्यम से उन्हें विश्व प्रसिद्ध 'इकोल नेशनल सुपेरियर डे ब्यू आर्ट्स' में शिक्षा ग्रहण करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। 

भारत वापस आने से पहले उन्होंने यूरोप और पश्चिमी एशिया की यात्रा की जहाँ उन्होंने विभिन्न प्रकार की कलाओं का अध्ययन किया। 

करियर 

उनकी पहली एकल प्रदर्शनी सन 1958 में लगी थी जिसके बाद इनकी कलाकृतियों की लगभग 50 प्रदर्शनियां लग चुकी हैं। 

अंजलि मेनन की कृतियां राष्ट्रीय आधुनिक कला संग्रह, नई दिल्ली, पीबाडी एसेक्स म्यूजियम, चंडीगढ म्यूजियम, द एशियन आर्ट म्यूजियम, सैन फ्रांसिस्को और जापान के फुकुओका म्यूजियम सहित दुनिया भर के कई निजी संग्रहों में रखी गई हैं। 

वे एक प्रसिद्ध भित्ति चित्रकार भी हैं और कई समारोहों में भारत का प्रतिनिधित्व कर चुकी हैं। 

व्यक्तिगत जीवन 

अध्ययन के उपरान्त फ्रांस से लौटने के बाद अंजलि इला मेनन ने अपने बचपन के मित्र और भारतीय नौसेना के अधिकारी राजा मेनन से विवाह कर लिया। विवाह के उपरान्त उन्होंने भारत के अलावा अमेरिका, यूरोप के कई देश, जापान और पूर्व सोवियत संघ में रहकर कार्य किया है। इन देशों में उन्होंने अपने काम की 30 से भी ज्यादा एकल प्रदर्शनी आयोजित की है। 

पुरस्कार और सम्मान 

सन 2000 में भारत सरकार ने उन्हें पद्म श्री से सम्मानित किया 

उनका नाम 'लिम्का बुक ऑफ़ रिकार्ड्स' में भी दर्ज है 

सन 2013 में दिल्ली सरकार ने उन्हें 'लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड' से सम्मानित किया 

सन 2013 में भारतीय कला और संस्कृति के क्षेत्र में बेहतरीन योगदान के लिए उन्हें दयावती मोदी पुरस्कार से सम्मानित किया गया

हेमा उपाध्याय



हेमा उपाध्याय एक भारतीय कलाकार थीं. उनका जन्म 1972 में बड़ौदा, भारत में हुआ था. 1998 के बाद से मुम्बई शहर में रहीं. 11 दिसंबर 2015 में उनकी और उनके वकील की हत्या कर दी गई. 

हेमा उपाध्याय 

जन्म - Hema Hirani, changed her name to Hema Upadhyay in 1998. 

18 मई 1972 

बड़ौदा, भारत 

मृत्यु - 11 दिसंबर 2015 (43 साल) 

मुंबई, भारत 

राष्ट्रीयता - भारतीय 

शिक्षा - Completed her Bachelor's (Painting) and Master's (Printmaking) in Fine Arts from M.S. College, Baroda in 1995 and 1997 individually. 

उपाध्याय विस्थापन तथा विरह के भावों को चित्रित करने के लिए फोटोग्राफी और कलाकृतियों की स्थापना का इस्तेमाल करती थीं. 

शुरूआती कार्य 

खट्टी-मीठी यादें 

हेमा की स्वीट स्वेट मेमोरीज (खट्टी-मीठी यादें) नामक पहली एकल प्रदर्शनी का आयोजन 2001 में चेमोल्ड (जिसे अब चेमोल्ड प्रेस्कॉट रोड, मुंबई के नाम से जाना जाता है) में किया गया था. इस प्रदर्शनी में कागज पर किये गए विविध प्रकार के कार्यों को शामिल किया गया था. इन कार्यों में उन्होंने 1998 में मुंबई आने के बाद के अपने प्रवास संबंधी विचारों को पेश करने के लिए स्वयं की तस्वीरों को शामिल किया था. आत्म-चित्रण के एक लघु फोटोग्राफिक संग्रह का शामिल किया जाना हेमा के चित्रों की एक सामान्य विशेषता है. विभिन्न मुद्राओं में अपनी छवियों को छोटा करके वे उन्हें अपने रूपात्मक परिदृश्यों में समावेशित कर अपने द्वारा रचित आलंकारिक तथा काल्पनिक वातावरण के साथ मिश्रित होने का मौका प्रदान करती हैं. 

खट्टी-मीठी यादें, एक नए स्थान पर जाने के बाद स्वाभाविक तौर पर उत्पन्न होने वाली अलगाव तथा नुकसान की भावना के साथ-साथ आश्चर्य और उत्साह की भावना को भी सुंदर तरीके से चित्रित करती है. कागज पर किये गए विविध प्रकार के कार्यों की यह प्रदर्शनी उनके एक पड़ोसी की आत्महत्या तथा उनके द्वारा एक ऐसे शहरी क्षेत्र में रहने के कारण उत्पन्न होने वाले भ्रम से प्रेरित थी, जहां स्वप्नों तथा आकांक्षाओं हवा देने के साथ-साथ बड़ी बेरहमी से कुचल भी दिया जाता है. इस प्रदर्शनी का प्रमुख चित्र इन भावनाओं को बेहद सुंदर तरीके से चित्रित करता है. यह एक चौड़े और मुस्कराते हुए मुख का एक करीबी चित्र (क्लोज अप) है जो सर्वव्यापी सड़न तथा पतन को दर्शाता है. 

अन्य कार्य 

2001 में हेमा की प्रथम एकल अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शनी आर्टस्पेस, सिडनी तथा इंस्टीट्यूट ऑफ मॉडर्न आर्ट, ब्रिस्बेन, ऑस्ट्रेलिया में आयोजित की गयी जिसमे उन्होंने दी निम्फ एंड दी एडल्ट (इसे नई दिल्ली में आयोजित होने वाले दसवें इंटरनेशनल ट्राईएनियल - इंडिया में भी प्रदर्शित किया गया था) नामक एक कलाकृति को प्रदर्शित किया; उन्होंने एकदम जीवंत लगने वाले 2000 कॉकरोच (तिलचट्टे) को हाथ से बनाया और अपने दर्शकों की घृणा तथा आकर्षण प्राप्त करने के लिए उन्हें पूरी गैलरी में छोड़ दिया. इस कार्य की मंशा दर्शकों को सैन्य गतिविधियों के परिणामों के बारे में सोचने हेतु प्रेरित करना था. 

द निम्फ और द अडल्ट, इन्सटॉलेशन, 2001, आर्टस्पेस, सिडनी, ऑस्ट्रेलिया 

2003 में उन्होंने मेड इन चाइना नामक एक सहयोगात्मक कार्य किया जिसमे बड़े पैमाने पर उवभोक्तावद , वैश्वीकरण तथा इनके कारण लुप्त होती पहचान के बारे में बताया गया था. उनका अगला सहयोगात्मक कार्य 2006 में अपनी मां बीना हीरानी के साथ मिलकर किया गया था; इस कार्य का शीर्षक था मम-माई (mum-my) और इसे शिकागो सांस्कृतिक केन्द्र में प्रदर्शित किया गया.

मंजीत बावा




मनजीत बावा (28 जुलाई 1940 - 29 दिसम्बर 2008) का जन्म भारत में, पंजाब के एक गांव ढुरी में हुआ। दिल्ली के कालेज ऑफ आर्ट्स और लंदन स्कूल ऑफ प्रिंटिंग से शिक्षा प्राप्त बावा पहले ऐसे कलाकार थे, जिन्होंने पाश्चात्य कला में बहुलता रखने वाले धूसर और भूरे रंग के वर्चस्व को तोड़कर चटक भारतीय रंगों (बैंगनी और लाल) को प्रमुखता दी। बांसुरी और गायों के प्रति बावा का आकर्षण बचपन से ही था, जो आजीवन साथ रहा। देशज रंगों और रूपाकारों के कुशल चितेरे बावा की कृतियों में ये आकर्षण विद्यमान है। लाल रंग उन्हें बेहद प्रिय था। वे नीले आकाश को भी लाल रंग से उकेरना चाहते थे। विलक्षण रंग प्रयोग की विशेषता के बावजूद सीमित रंगों का प्रयोग और व्यापक रंगानुभव, सूफीयना तबीयत के कलाकार बावा के कला संसार की पहचान है। 

कला समीक्षक उमा नायर के अनुसार बावा, कला में नव आंदोलन का हिस्सा थे। रंगों की उनकी समझ अद्भुत थी।उन्होंने भारतीय समकालीन कला को अंतरराष्ट्रीय मंच पर ख्याति दिलाने का जो काम किया है, उसे कला जगत में हमेशा याद किया जाएगा। 

जब वे दिल्ली में रहते हुए कला की शिक्षा ले रहे थे तब उनके गुरु थे सोमनाथ होर और बी सी सान्याल , लेकिन उन्होंने अपनी पहचान बनाई अबानी सेन की छत्रछाया में। श्री सेन ने उनसे कहा था कि रोज पचास स्कैच बनाओ। मनजीत बावा रोज पचास स्कैच बनाते और उनके गुरु इनमें से अधिकांश को रद्द कर देते थे। यहीं से मनजीत बावा के रेखांकन का अभ्यास शुरू हुआ। उन्होंने अपने उन दिनों को याद करते हुए कहीं कहा भी था कि तब से मेरी लगातार काम करने की आदत पड़ गई। जब सब अमूर्त की ओर जा रहे थे मेरे गुरुओं ने मुझे आकृतिमूलकता का मर्म समझाया और उस ओर जाने के लिए प्रेरित किया। वे आकृतिमूलकता की ओर आए तो सही लेकिन अपनी नितांत कल्पनाशील मौलिकता से उन्होंने नए आकार खोजे, अपनी खास तरह की रंग योजना का आविष्कार किया और मिथकीय संसार में अपने विषय ढूँढ़े। यही कारण है कि उनके चित्र संसार में ठेठ भारतीयता के रंग व आकार देखे जा सकते हैं। वहाँ हीर-राँझा, कृष्ण, गोवर्धन, देवी तथा कई मिथकीय और पौराणिक प्रसंग-संदर्भ और हैं। इसके साथ ही उनके चित्रों में जितने जीव-जंतु हैं उतने शायद किसी अन्य भारतीय कलाकार में नहीं। 

70 के दशक में स्व. जगदीश स्वामीनाथन के संपर्क में आकर मनजीत की कला में बड़ा फर्क आया था। भारतीय मिनिएचर कला से उन्हें बहुत कुछ सीखने का मौका मिला। पहाड़ी मिनिएचर और सिख मिनिएचर से उनका गहरा और सार्थक संवाद था। मनजीत चटक रंगों के विशेषज्ञ थे। लाल रंग खासतौर से उनकी कृतियों में सबसे ज्यादा बोलता है। सरल सूफियाना, काव्यात्मक छवियों को वह अद्भुत रूप दे देते थे। अपने स्टूडियो में मनजीत एक दिव्य आध्यात्मिक उपस्थिति थे। 

भारत भवन भोपाल में रूपंकर कला निदेशक रहे मंजीत बावा को रूपंकर कलाओं में दिए गए योगदान के लिए कालिदास सम्मान प्रदान किया गया था।

तैयब मेहता



पूरा नाम -तैयब मेहता 

जन्म - 26 जुलाई 1925 

जन्म भूमि-  गुजरात, ज़िला खेडा

मृत्यु - 2 जुलाई 2009

पत्नी - सकीना

संतान - पुत्र युसूफ और पुत्री हिमानी

कर्म भूमि -  भारत

कर्म-क्षेत्र - चित्रकला

पुरस्कार/उपाधि - पद्म भूषण

नागरिकता - भारतीय

अन्य जानकारी - सन 2002 में क्रिस्टी की नीलामी में जब उनकी एक पेंटिंग ‘सेलिब्रेशन’ लगभग 1.5 करोड़ रुपये में बिकी तब उस समय किसी भी भारतीय चित्रकार की यह सबसे महंगी पेंटिंग थी।

तैयब मेहता एक जाने-माने भारतीय चित्रकार थे। वे प्रसिद्ध ‘बॉम्बे प्रोग्रेसिव आर्टिस्ट्स ग्रुप’ के सदस्य थे। इस समूह में एफ.एन. सौज़ा, एस एच रज़ा और एम एफ हुसैन जैसे महान कलाकार भी शामिल थे। वे स्वतंत्रता के बाद की पीढ़ी के उन चित्रकारों में से थे जो राष्ट्रवादी बंगाल स्कूल ऑफ़ आर्ट के परंपरा से हटकर एक आधुनिक विधा में कार्य करना चाहते थे। उनके जीवन के अंतिम दशक में उनकी बनायीं हुई पेंटिंग्स रिकॉर्ड कीमतों पर बिकीं जिसमें उनके मृत्यु के बाद बिकी एक पेंटिंग भी शामिल है जो दिसंबर 2014 में 17 करोड़ रुपये से ज्यादा कीमत पर बेची गयी। इससे पहले भी मेहता की एक पेंटिंग ‘गर्ल इन लव’ लगभग 4.5 करोड़ रुपये में बिकी थी। सन 2002 में उनकी एक पेंटिंग ‘सेलिब्रेशन’ लगभग 1.5 करोड़ रुपये में बिकी थी जो अन्तराष्ट्रीय स्तर पर उस समय तक की सबसे महंगी भारतीय पेंटिंग थी।

आज भारतीय कला में सारी दुनिया की दिलचस्पी है और इस दिलचस्पी का एक बड़ा श्रेय तैयब मेहता को भी जाता है। जब क्रिस्टी जैसी कलादीर्घा ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर उनकी कृतियों की नीलामी की तो भारतीय कला के लिए ये एक बड़ी बात थी। समकालीन भारतीय कला इतिहास में तैयब मेहता ही अकेले पेंटर थे जिनका काम इतने कीमतों में बिका।

जीवन परिचय
तैयब मेहता का जन्म  गुजरात  के खेड़ा जिले में हुआ था। उनका पालन-पोषण मुम्बई के क्रावफोर्ड मार्केट में दावूदी बोहरा समुदाय में हुआ था। सन 1947 में उन्होंने विभाजन के बाद हुए दंगों में मुम्बई के मोहम्मद अली रोड पर एक व्यक्ति को पत्थर से मारे जाने की हृदय विदारक घटना देखी थी। इस घटना ने उनको इतना प्रभावित किया कि उनके कामों में इसकी झलक कहीं न कहीं हमें दिख ही जाती है।

तैयब मेहता ने प्रारंभ में कुछ समय के लिए मुंबई स्थित एक नामी फिल्म स्टूडियो ‘फेमस स्टूडियोज’ के लैब में फिल्म एडिटर का कार्य किया। बाद में उन्होंने मुम्बई के सर जे.जे. स्कूल ऑफ़ आर्ट्स में दाखिला लिया और सन 1952 में यहाँ से डिप्लोमा ग्रहण किया। इसके बाद वे ‘बॉम्बे प्रोग्रेसिव आर्टिस्ट्स ग्रुप’ के सदस्य बन गए। यह ग्रुप पश्चिम के आधुनिकतावादी शैली से प्रभावित था और तैयब के साथ-साथ उसमें एफ.एन. सौज़ा, एस एच रज़ा और एम एफ हुसैन जैसे महान कलाकार भी शामिल थे।

अतुल डोडिया





 (जन्म 1959, घाटकोपर , मुम्बई, भारत में) एक भारतीय कलाकार हैं। 

जीवनी 

अतुल ने 1980 के शुरुआती दिनों में मुंबई के सर जे स्कूल ऑफ आर्ट से स्नातक की पढ़ाई के बाद अपने काम का प्रदर्शन और बिक्री शुरू की, जहाँ उन्होंने BFA डिग्री प्राप्त की। उन्होंने 1991 में 1992 तक पेरिस में अपना शैक्षणिक प्रशिक्षण फ्रेंच सरकार द्वारा प्रदान की गई छात्रवृत्ति के बाद दिया । 

अतुल भारत में कई एकल शो कर चुके हैं और 'रिफ्लेक्शन्स एंड इमेजेज' वाडेहरा आर्ट गैलरी, नई दिल्ली और मुंबई, 1993 और 'ट्रेंड्स एंड इमेजेज' CIMA, कलकत्ता, 1993 में प्रदर्शित हैं। भारत के बाहर, उन्होंने गैलरी अपुन्टो, एम्स्टर्डम में प्रदर्शन किया है। 1993, 1986-89 में 'द रिचनेस ऑफ द स्पिरिट' कुवैत और रोम में भाग लिया, 'भारत - समकालीन कला' वर्ल्ड ट्रेड सेंटर, एम्सटर्डम 1989, 'एक्सपोज़र कलेक्टिव' का हवाला देहात कला, पेरिस 1992। अतुल जोडिया ने एक के रूप में प्रतिनिधित्व किया। इंडिया मंडप, वेनिस बिएनले 2019 के कलाकारों ने 2002 में महात्मा गांधी के दर्शन से प्रेरित "ब्रोकन ब्रांच" शीर्षक से एक इंस्टॉलेशन प्रदर्शित किया। उन्हें  1995 में संस्कृत पुरस्कार, नई दिल्ली दिया गया। हाल ही में एक पेंटिंग,"द वॉल" नाम की नीलामी में 57.6 लाख रुपये मिले। 

अतुल डोडिया ने साथी चित्रकार अंजू डोडिया से शादी की है और मुंबई में रहते हैं और काम करते हैं। 

एकल प्रदर्शनियों 

2010 मालेविच मैटर्स एंड अदर शटर्स , वाडेहरा आर्ट गैलरी, नई दिल्ली 

2008 पैले पूर्वजों , बोधि कला, मुंबई 

2007 वाडेहरा आर्ट गैलरी, नई दिल्ली संग्रहालय गैलरी, मुंबई केमॉल्ड प्रेस्कॉट, मुंबई 

2006 सुमुख गैलरी, बैंगलोर सिंगापुर; टायलर प्रिंट इंस्टीट्यूट, सिंगापुर; बोधि आर्ट, नई दिल्ली, मुंबई, न्यूयॉर्क 

2005 ललित कला संकाय, वडोदरा; बोस पैकिया, न्यूयॉर्क 

2004 ललित कला संकाय, वडोदरा 

2003 बोस पैकिया, न्यूयॉर्क 

2002 वाल्श गैलरी, शिकागो; साक्षी गैलरी, बॉम्बे; रीना सोफिया संग्रहालय, मैड्रिड 

2001 द फाइन आर्ट रिसोर्स, बर्लिन; जापान फाउंडेशन एशिया सेंटर, टोक्यो; गैलरी चेमॉल्ड, बॉम्बे 

1999 वाडेहरा आर्ट गैलरी, नई दिल्ली; गैलरी चेमॉल्ड, बॉम्बे 

1997 सीमा गैलरी, कलकत्ता 

1989 91, 95,97, गैलरी चेमॉल्ड, बॉम्बे 

पुरस्कार 

2008 - रज़ा अवार्ड, रज़ा फ़ाउंडेशन 

1999 - Civitella Ranieri Foundation फैलोशिप, इटली 

1999 -  सोथबी का पुरस्कार 

1995 - संस्कृतिक पुरस्कार 

1982 -  महाराष्ट्र स्वर्ण पदक

अर्पणा कौर




अर्पणा कौर एक प्रमुख भारतीय चित्रकार और ग्राफिक कलाकार हैं। 

                        अर्पणा कौर

राष्ट्रीयता - भारतीय
जाना जाता है - चित्रकारी
अजीत कौर - (मां)

वह एक सिख परिवार से आती हैं, जो ब्रिटिश भारत के विभाजन पर भ्रम की स्थिति के दौरान 1947 में पश्चिम पंजाब भाग गए थे । उनकी मां अजीत कौर (1934 में पैदा हुई), एक लेखक हैं, जो पंजाबी में लिखती हैं । कोर या कौर (उच्चारण कोर) एक धार्मिक उपनाम है जो सभी महिला सिखों द्वारा प्रयोग किया जाता है। 
उनके जन्म के बाद से उनका पहला नाम अर्पणा नहीं था, लेकिन उन्होंने पंद्रह साल की उम्र में इसे व्यक्तिगत विकास प्रक्रिया की अभिव्यक्ति के रूप में अपनाया । 

प्रारंभिक जीवन और शिक्षा

अर्पणा कौर का जन्म 1954 में दिल्ली में हुआ था। कला, संगीत और साहित्य के लिए उनका प्रदर्शन उनके जीवन में जल्दी हुआ। उन्होंने सितार सीखा, कविता लिखी लेकिन सबसे ज्यादा पेंटिंग करने में मजा आया। नौ साल की उम्र में, उन्होंने अमृता शेरगिल के कामों से प्रेरित होकर अपनी पहली ऑयल पेंटिंग 'मदर एंड डॉटर' बनाई । अर्पणा से स्नातक की उपाधि दिल्ली विश्वविद्यालय एक साथ MA साहित्य में डिग्री। चित्रकला में उसे कभी औपचारिक प्रशिक्षण नहीं मिला, और उन्होंने काफी हद तक स्वयं सीखा। वह 1982 में इसे पूरा करते हुए नई दिल्ली के गढ़ी स्टूडियो में नक्कासी तकनीक का प्रशिक्षण प्राप्त करने के लिए आगे बढ़ी ।

प्रभाव और शैली
अर्पणा कौर के चित्रों को उनके आसपास की घटनाओं और स्थितियों द्वारा आकार दिया गया था। उसकी माँ का उसके कार्यों में उसका गहरा प्रभाव; जहां 'महिला' अक्सर केंद्रीय ध्यान केंद्रित करती है। उनकी रचनाएँ पहाड़ी लघुचित्र (पहाड़ी-चित्र), पंजाबी साहित्य और भारतीय लोक कला से भी प्रेरित हैं ।

'आध्यात्मिकता', और 'समय' उसके कार्यों में आवर्ती विषय हैं।

1990 के दशक में, कौर ने वर्ली और गोडाना के स्वदेशी जातीय समूहों से भारतीय लोक कलाकारों के साथ सहयोग की एक श्रृंखला बनाई , जो भारत के बिहार राज्य के मधुबनी क्षेत्र में रहते थे । वह उन पहली समकालीन कलाकारों में से एक हैं जिन्होंने लोक कलाकारों का सहयोग किया है।

1994 में उन्हें आधुनिक कला के हिरोशिमा संग्रहालय द्वारा बमबारी की 50 वीं वर्षगांठ के अवसर पर एक भित्ति बनाने के लिए एक बड़ा काम सौंपा गया था।

समूह प्रदर्शनियां

1988 ग्रेवन इमेजेज 

1988 नुमाइश लैत कला

1992 क्रॉसिंग ब्लैक वाटर्स

1995 इनसाइड आउट: समकालीन महिला कलाकार भारत की , मिडिल्सब्रा

समीक्षा, लेख ग्रंथ 
एडी चैम्बर्स, ' इनसाइड आउट: समकालीन महिला कलाकार भारत ' , कला मासिक नंबर 193, (फरवरी1996)

पुरस्कार और सम्मान 
ऑल इंडिया फाइन आर्ट्स सोसाइटी अवार्ड, 1985

6 वें भारत त्रिवेणी 1986 में स्वर्ण पदक (ललित कला अकादमी द्वारा सम्मानित)

संग्रह 

विक्टोरिया और अल्बर्ट संग्रहालय लंदन

रॉकफेलर संग्रह, न्यूयॉर्क

समकालीन कला का संग्रहालय, लॉस एंजिल्स

सिंगापुर कला संग्रहालय, सिंगापुर

नेशनल गैलरी ऑफ़ मॉडर्न आर्ट, नई दिल्ली

अनीता दुबे


        

       अनीता दुबे का जन्म 28 नवंबर 1958 को लखनऊ उत्तरप्रदेश , भारत में चिकित्सकों के परिवार में हुआ था।
उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से इतिहास में बी.ए. पूरा किया। उन्होंने महाराजा सयाजीराव विश्वविद्यालय से कला आलोचना में अपना एमएफए पूरा किया , जो उस विश्वविद्यालय के ललित कला संकाय में विशेष रूप से उत्पादक और प्रभावशाली अवधि के दौरान था। । 

जब 1989 में केपी कृष्णकुमार की मृत्यु के बाद इंडियन रेडिकल पेंटर्स एंड स्कल्पर्स एसोसिएशन का विघटन हो गया, तो दुबे ने अपना ध्यान लेखन और आलोचना से हटकर दृश्य कला बनाने में लगा दिया, जिसमें एक सौंदर्यवादी मुहावरा विकसित हो रहा था जिसमें वस्तुओं और औद्योगिक सामग्रियों, शब्द-क्रीड़ा और फोटोग्राफी का इस्तेमाल किया गया था। भारत और उसके बाहर मौजूदा सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियों का निरंतर विश्लेषण और समालोचना प्रस्तुत करना। फिलिप वर्गेन, 2003 के एक निबंध में लिखते हैं कि ड्यूब का काम "व्यक्तिगत और सामाजिक यादों, इतिहास, पुराणों और घटना संबंधी अनुभवों के सांस्कृतिक वाहक के रूप में विशेषाधिकार मूर्तिकला।" 

दूबे की भाषा-आधारित मूर्तिकला विशेष रूप से उल्लेखनीय है। उसने कहा है कि वह "एक शब्द वास्तुकला कैसे बन सकता है" में रुचि रखती है। 

पांच अलग-अलग टुकड़ों से मिलकर, 5 शब्द भयावह क्रॉस-सांस्कृतिक शब्दार्थों और पांच मूल्य-युक्त शब्दों की मूर्तिकला की संभावनाओं की पड़ताल करते हैं, जो डब्ल्यू अक्षर से शुरू होते हैं। काम का एक और निकाय जिसे ड्यूब के लिए जाना जाता है, जिसमें चिपकने वाला, औद्योगिक रूप से समर्थित का उपयोग शामिल है। उत्पादित चीनी मिट्टी की आंखें आमतौर पर हिन्दू धार्मिक छवियों से जुड़ी होती हैं । इस तरह के काम का एक उदाहरण द स्लीप ऑफ रीजन क्रिएशन मॉन्स्टर्स है। पहली बार फिनलैंड के हेलसिंकी में कश्यम संग्रहालय के समकालीन संग्रहालय में स्थापित किया गया , जो 1789 और 1798 के बीच निर्मित फ्रांसिस्को गोये के प्रसिद्ध सेट एक्वाटिंट प्रिंट, लॉस कैप्चरिक का संदर्भ देता है। 

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर, उसका काम गद्दा फैक्टरी , पिट्सबर्ग में प्रदर्शित किया गया है। 

1997 में, दूबे ने खोज को नई दिल्ली में एक अंतर्राष्ट्रीय कलाकार संघ के रूप में प्रदर्शित किया। एक अपेक्षाकृत मामूली वार्षिक कार्यशाला के रूप में शुरू किया गया जो वैश्विक कार्यशालाओं, निवासों और प्रदर्शनियों के आयोजन के लिए एक वैश्विक संदर्भ में दक्षिण एशियाई कला का एक प्रमुख मंच बन गया है।

Thursday, May 21, 2020

शिल्पा गुप्ता

शिल्पा गुप्ता




जन्म-1976 मुंबई, भारत 

राष्ट्रीयता - भारतीय 

शिक्षा - सर जमशेदजी जीजेभॉय स्कूल ऑफ आर्ट 

कार्यक्षेत्र - मूर्तिकला 

काम के शुरुआती उदाहरणों में, शीर्षकहीन (1995-96) शामिल हैं , जहां कलाकार को गुमनाम रूप से पोस्ट, 300 ड्रॉइंग के माध्यम से भेजा गया था, जिसे कई बार क्रमांकित और मुद्रांकित किया गया था। अनटाइटल्ड (1999) में गुप्ता तीर्थयात्री की भूमिका निभाते हैं, अपने खाली कैनवस को धन्य बनाने के लिए पवित्र स्थानों का दौरा करते हैं। एक बार, काम विश्वास और विश्वास के तंत्र की खोज है और "समाज की सामूहिक धार्मिक आकांक्षाओं को प्रकट करने" में कलाकार की भूमिका पर सवाल उठाता है। इस कार्य में कई पुनरावृत्तियाँ थीं, अंतिम एक, धन्य ' बैंडविड्थ , एक इंटरनेट कला कार्य, जिसे 2001 में टेट मोडर्न द्वारा कमीशन किया गया था। वेबसाइट ने दर्शकों को एक केबल के माध्यम से जुड़े ऑनलाइन पृष्ठों के माध्यम से ऑनलाइन आशीर्वाद देने के लिए आमंत्रित किया, जो कलाकार को विभिन्न पूजा स्थलों पर ले जाया गया। वेबसाइट पर, जिसने इसके लॉन्च पर कई हजारों लिंक एकत्र किए थे, आगंतुक अलग-अलग धर्मों से God.exe और पवित्र वाटर्स की छवियों को डाउनलोड कर सकता था, उन तरीकों की खोज कर रहा था, जिनमें हम अपनी दुनिया को परिभाषित और निर्माण करते हैं। 

वह कहती है, "मुझे धारणा में दिलचस्पी है और इसलिए, कैसे परिभाषाएँ खिंचती हैं या अतिचार होते हैं, यह लिंग, विश्वास या राज्य की धारणा है।" 

गुप्ता ने 1947 के विभाजन के प्रभावों को दर्शाने वाली कई परियोजनाएँ बनाई हैं। वह आर पार परियोजना (2002-2004) की अगुवाई करने वाले कलाकारों में से एक थीं, जो भारत-पाकिस्तान सीमा के विभिन्न कलाकारों द्वारा रोजमर्रा की सार्वजनिक जगहों पर प्रदर्शित होने के लिए काम करती थीं। और उनके काम में, इन आवर टाइम्स (2008) में , जिसमें एक ध्रुव के छोर पर दो माइक्रोफोन होते हैं, जो आगे और पीछे झूलते हैं, 1947 में पाकिस्तान के जिन्ना और भारत के नेहरू द्वारा दिए गए उद्घाटन भाषणों को आशा के साथ दबाया जा सकता है। सुना। कार्य एक को दो दृष्टियों में समानता और अंतर को प्रतिबिंबित करने और उन राजनीतिक निर्णयों पर सवाल उठाने की ओर ले जाता है जिसमें दोनों नेताओं को फंसाया गया था। 

2006 में गुप्ता का मल्टी-चैनल वर्क अनटाइटल्ड (पत्नियों का निराकरण ), कश्मीर में उन महिलाओं की चिंताओं को संबोधित करता है जिनके पति लापता हो गए हैं और राज्य द्वारा मृत घोषित नहीं किया जा सकता है, पत्नियों को एक उग्र अनिश्चितता से निपटने के लिए छोड़ दिया गया है। दर्शकों को कदम से कदम की स्थापना की अलग-अलग परतों की खोज करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है: किसी को पिछले पर्दे पर चलने से वीडियो प्रक्षेपण के लिए एक रास्ता बनाना पड़ता है, जिस पर बुने हुए स्पीकर होते हैं जो मल्टी-ऑडियो ट्रैक से बाहर निकलते हैं और कपड़े के सेट से कपड़े के माध्यम से लटकाए जाते हैं। जिन कपड़ों को लटका दिया गया है, वे विवादास्पद हैं या उन पर असली एक्सटेंशन हैं, जिन पर राज्यों के रजिस्टरों के संख्यात्मक रिकॉर्ड का एक वीडियो स्ट्रीम किया गया है, एक भेदी सुई के माध्यम से सिले जा रहा है। वीडियो में सफेद कपड़े पहने एक महिला को दिखाया गया है, जो एक ही कपड़े से बना झंडा ले जाती है। जबकि उसके आंदोलनों और इशारों ने सैन्य कठोरता को उकसाया, एक आकाश-नीली पृष्ठभूमि के खिलाफ उसकी स्थिति काम के लिए किसी भी स्थान को बाधित करती है। लूप किए गए वीडियो में प्राधिकरण, राष्ट्र-निर्माण और सीमा पार से उग्रवाद की स्थिति में पक्षाघात की भावना का उल्लेख किया गया है। गुप्ता का कार्य सांस्कृतिक और ऐतिहासिक हिंसा की जांच करता है, न केवल एक वैकल्पिक इतिहास लेखन का सुझाव देने के लिए, बल्कि स्वयं की और स्वयं के निर्माण के तरीकों के बारे में अधिक जागरूकता को प्रोत्साहित करने के लिए।

गुप्ता ने 2001 से कपड़ों पर बुने जाने वाले स्पीकरों से लेकर ध्वनि आधारित संवादात्मक ऑडियो आधारित इंस्टॉलेशन के लिए ध्वनियों वाले माइक्रोफोन तक की श्रृंखला का निर्माण किया है। सिंगिंग क्लाउड (2008) 4000 माइक्रोफोनों से बना साउंड इंस्टॉलेशन है, जिसमें उनके कार्य को उलट दिया गया है, मानव जीवन के अतिव्यापी अनुभव के रूपक के रूप में कार्य करता है, समय और स्थान की सीमाओं को पार करके और एक सामंजस्यपूर्ण पूरे में एक साथ असमान तत्वों को इकट्ठा करता है। 

उनकी संवादात्मक रचनाएँ दर्शकों को एक कलाकार बनने में फ्यूज़ करती हैं। स्पीकिंग वॉल में , 2010 से एक इंस्टॉलेशन, विज़िटर एक हेडसेट डोंस करता है, ईंटों की एक पंक्ति पर कदम रखता है जो दीवार में मृत-अंत होता है। फिर कुछ अप्रत्याशित होता है: हेडसेट में एक आवाज आगंतुक को बताती है कि ईंटों के साथ कहां और कब चलना है; दर्शकों के सदस्य की पहचान मनमाने ढंग से कलाकार के लिए स्थानांतरित कर दी जाती है। "मैं हमेशा वसीयत को प्रमाणित करने, इच्छाशक्ति पर डुप्लिकेट करने और नियंत्रण करने के लिए प्रेरित करता रहा हूं। इस तरह के अयोग्य क्रेविंग को मिरर करने के लिए प्रौद्योगिकी सबसे आगे रही है। चाहे वह शॉपिंग मॉल में हो या हवाई अड्डे पर, हम सभी ने देखा है। नाटक, सुस्ती और अपरिमेय स्तरों के लिए भव्य सुरक्षा इशारे। " 

थ्रेट (2008) एक ईंट की दीवार से बना एक काम है, जिसे अलग-अलग ईंटों की तरह बनाया गया है, जिसमें एक-एक शब्द "धमकी" लिखा गया है। ईंटों के रूप में लंबे समय तक चलने वाली वस्तुओं को उकसाने के लिए साबुन जैसी एक अभेद्य सामग्री को नियोजित करके, सुश्री गुप्ता दर्शकों को दुनिया के बारे में अपनी धारणाओं पर सवाल उठाने के लिए उकसाना चाहती है। 

गुप्ता ने 1990 के दशक के मध्य में अपने शुरुआती इंटरेक्टिव कार्यों से कला अभ्यास की सीमाओं को लगातार आगे बढ़ाया, वेबसाइटों, टच स्क्रीन से लेकर बड़े पैमाने पर इंटरैक्टिव वीडियो प्रोजेक्शन तक। शीर्षकहीन, (2004) में , सात एनिमेटेड आंकड़े, जो आगंतुकों द्वारा सक्रिय रूप से नियंत्रित किए जा सकते हैं, क्रमादेशित आदेशों के अनुसार चलते हैं। उनके निर्देश और कथन, जैसे कि वे स्वचालित हों, प्रक्षेपण के सामने फर्श पर चलते हैं। 

इस काम से इंटरेक्टिव वीडियो अनुमानों की एक श्रृंखला बनी 1,2,3 जहां काम के क्षेत्र में आने वाले आगंतुकों को कमरे में स्थापित एक कैमरा द्वारा फिल्माया जाता है, और रिकॉर्ड की गई छवियों को वास्तविक रूप में पेश किया जाता है। 

किसी और ने - 100 पुस्तकों की एक लाइब्रेरी जिसे गुमनाम रूप से या छद्म नामों के तहत लिखा गया है (2011) स्थापना में पहले संस्करण कवर की नक़्क़ाशी के साथ छद्म नाम से प्रकाशित विभिन्न पुस्तकों के आकार और आकारों में एक सौ धातु के मामले शामिल हैं। 

2011 में स्थापना के बाद से, यह परियोजना दुनिया के विभिन्न हिस्सों में पांच सार्वजनिक पुस्तकालयों में दिखाई गई है। 

कलाकार ने कई आउटडोर लाइट्स का काम किया है, जिसमें 'मैं आपके आकाश के नीचे भी रहता हूं' (2004) जो 2013 में उसके पड़ोस में कार्टर रोड पर स्थापित किया गया था। 

इन माई ईस्ट इज योर वेस्ट (2014), एक एनिमेटेड लाइट इंस्टॉलेशन, विभिन्न पत्र अकालिन व्यवस्था में अलग-अलग समय पर प्रकाश डालते हैं ताकि शब्द मेरे पूर्व में बन सकें । अक्षर बड़े हैं, एक इमारत के ऊपर स्थित है, जो आकाश के बदलते हुए रंगों से बना है। 

(2018) में एक मल्टी-चैनल साउंड इंस्टॉलेशन जो गुप्ता के 100 कवियों को आवाज देने की कोशिश को प्रदर्शित करता है जो उनकी कविता और उनकी मान्यताओं के लिए कैद और खामोश थे। । स्थापना में कैदियों की धातु की छड़ों पर लगाई गई कविताओं की मुद्रित शीट शामिल हैं, उसी के रिकॉर्ड किए गए पाठ के साथ।


भारती खेर



भारती खेर का जन्म 1969 में लंदन, इंग्लैंड में भारतीय माता-पिता के घर हुआ था। 
1987-88 से खेर ने मिडलसेक्स पॉलिटेक्निक, कैट हिल, लंदन, यूके में अध्ययन किया। 
उन्होंने 1991 में न्यूकैसल पॉलिटेक्निक से चित्रकला में बी.एफ.ए. 23 साल की उम्र में किया । वह भारत में नई दिल्ली चली आयीं। ओर यहीं रहकर काम करती हैं। 
उनकी शादी भारतीय समकालीन कलाकार सुबोध गुप्ता से हुई और उनके 2 बच्चे हैं।
भारती खेर ने कई तरह के मीडिया में पेंटिंग, मूर्तियां, इंस्टॉलेशन और टेक्स्ट बनाने का काम किया है।
 खेर की प्राथमिक सामग्री में पारंपरिक भारतीय बिंदी के निर्मित संस्करण हैं। अपने पूरे करियर में खेर ने 1980 के दशक के अंत से लेकर 1990 के दशक तक अपने छात्रा जीवन से ही अपने चित्रों में कुछ दोहराए जाने वाले पैटर्न को जगह दी हैं। खेर मानती हैं कि हमारे वर्तमान समय में मानव जीवन की वास्तविकताओं को समझना बहुत जरूरी है। उनकी रचनाएँ मानव नाटक के साथ-साथ आंतरिक प्रेम के प्रति प्रेम प्रदर्शित करती हैं। उनकी मूर्तियां और कोलाज अक्सर संकर रूपों को दर्शाते हैं जो विभिन्न सामाजिक निर्माणों जैसे कि नस्ल, और लिंग आदि को समेटे हुए हैं। द स्किन स्पीक्स एक मूर्तिकला है जो फाइबरग्लास से बनी एक जीवन आकार की मादा हाथी का प्रतिनिधित्व करती है और कई बिन्दुओं द्वारा सजी है। यह मूर्ति भारतीय परंपरा (बिंदी) और हिंदू धर्म (हाथी) के सबसे सामान्य प्रतीकों में से दो को जोड़ती है। इस मूर्तिकला को भारत के अभिलेख के रूप में देखा जा सकता है।

खेर ने 1993 से बड़े पैमाने पर आर्ट प्रदर्शन किया है। उनका काम ऑल इंडिया फाइन आर्ट्स एंड क्राफ्ट्स सोसाइटी (एआईएफएसीएस), आयरिश म्यूजियम ऑफ मॉडर्न आर्ट इसाबेला स्टीवर्ट गार्डनर संग्रहालय, जैक शिनमैन गैलरी, फ्राइडर बर्दा संग्रहालय, में दिखाया गया है व संग्रहित है। द रॉकबुंड आर्ट म्यूजियम, फ्रायड म्यूजियम लंदन, कनाडा की राष्ट्रीय गैलरी, और वैंकुवर आर्ट गैलरी में भी कलाकृतियां प्रदर्शित की गयीं।


Thursday, May 14, 2020

सुबोध गुप्ता

 
    
सुबोध गुप्ता नई दिल्ली में स्थित एक भारतीय समकालीन कलाकार हैं। 

कार्यक्षेत्र-मूर्तिकला, स्थापना, पेंटिंग, फोटोग्राफी, प्रदर्शन और वीडियो हैं। 

गुप्ता का जन्म बिहार में हुआ था। उनके पिता, एक रेलवे गार्ड की नौकरी करते थे। उनकी मृत्यु उनके प्रारंभिक चालीसवें वर्ष में हो गई थी, जब गुप्ता 12 साल के थे। उनकी माँ एक किसान परिवार से आती थीं और गुप्ता को एक दूरदराज के गाँव में कुछ वर्षों के लिए अपने भाई के साथ रहने के लिए भेजती थीं। 

वो बताते हैं कि "उनके पास स्कूल के जूते नहीं थे, और स्कूल जाने के लिए कोई सड़क नहीं थी। कभी-कभी हम मैदान में रुक जाते थे और हम स्कूल जाने से पहले हरी चने खाकर बैठ जाते थे, "उन्होंने ये बात द टाइम्स के लिए गिन्नी डोगरी के साथ एक साक्षात्कार में कही थी। " स्कूल छोड़ने के बाद, गुप्ता चार छोटे थिएटर समूहों में से एक में शामिल हो गए। खगौल में और पाँच वर्षों तक एक अभिनेता के रूप में काम किया। उन्होंने नाटकों का विज्ञापन करने के लिए पोस्टर भी डिजाइन किए, तब पहली बार उन्हें यह सुझाव दिया गया था कि वे कला महाविद्यालय जाएं और कला की पढ़ाई करें। उन्होंने कॉलेज ऑफ आर्ट, पटना (1983-1988 से) में अध्ययन के दौरान एक अंशकालिक समाचार पत्र के लिए डिजाइनर और चित्रकार के रूप में काम किया। एक दिन उन्हें अखबार द्वारा एक स्थायी नौकरी की पेशकश की गई, उन्होंने दिल्ली में अपनी किस्मत आजमाने के लिए इसे करने लगे। उन्हें सरकार द्वारा संचालित पहल से छात्रवृत्ति मिली, और गढ़ी स्टूडियो में काम करने के लिए एक स्थान मिला। "डौगारी ने लिखा उनके 2009 के लेख में कि "सुबोध गुप्ता, भारत के सबसे नए कलाकार हैं। 

गुप्ता को पूरे भारत में डेली यूज़ की वस्तुओं को शामिल करके सृजन के लिए सबसे ज्यादा जाना जाता है। जैसे कि स्टील टिफिन बॉक्स जिसका उपयोग लाखों लोग अपने दोपहर के भोजन के साथ-साथ थेली पैन, साइकिल और दूध की पुड़िया के लिए करते हैं। ऐसी साधारण वस्तुओं से कलाकार अपनी मातृभूमि के आर्थिक परिवर्तन को दर्शाता है और जो गुप्त के अपने जीवन और यादों से संबंधित है। 

जैसा कि गुप्ता कहते हैं: 'ये सभी चीजें मेरे बड़े होने के तरीके का हिस्सा थीं। उनका उपयोग उन अनुष्ठानों और समारोहों में किया जाता था जो मेरे बचपन का हिस्सा थे। भारतीय या तो उन चीजों को याद करते हैं, या वे उन्हें याद करना चाहते हैं। और:' मैं मूर्तिकार हूं। मैं हिंदू जीवन के तौर तरीकों से सृजन चोरी करता हूं। 

खाना पकाने के बर्तनों से मिलकर उनका एक इंस्टालेशन 'लाइन ऑफ कंट्रोल' (2008) है, जिसमें एक विशाल मशरूम बादल पूरी तरह से बर्तन और धूपदान का निर्माण करता है। यह काम 2009 में टेट ब्रिटेन में टेट त्रिवेणी में दिखाया गया था और वर्तमान में दिल्ली में किरण नादर म्यूज़ियम ऑफ़ आर्ट में प्रदर्शित किया गया है। 

कैनवस पेंटिंग 'सात समुंदर पार' पर उनका तैल रंग पेंटिंग नीलामी में 34 मिलियन रुपये में गया। 2008 में, उन्होंने कई अन्य कलाकारों के साथ बिहार बाढ़ पीड़ितों के लिए 39.3 मिलियन जुटाए। 

उन्होंने स्टेनलेस स्टील से एक बरगद का पेड़ बनाया है जिसे नई दिल्ली के नेशनल गैलरी ऑफ़ मॉडर्न आर्ट में रखा गया है।

Saturday, May 9, 2020

वी एस गायतोंडे

वासुदेव एस गायतोंडे

जन्म
1924
महाराष्ट्र

मृत्यु
10 अगस्त 2001 (आयु 77 वर्ष)

राष्ट्रीयता
भारतीय

शिक्षा
सर जे जे स्कूल ऑफ आर्ट
अमूर्त चित्रकारी

आंदोलन
अमूर्त अभिव्यंजनावाद

पुरस्कार
रॉकफेलर फैलोशिप 1964
पद्म श्री 1971

    उनके काम से प्रभावित होकर, वासुदेव को 1947 में प्रोग्रेसिव आर्टिस्ट्स ग्रुप ऑफ़ बॉम्बे में शामिल होने के लिए आमंत्रित किया गया था, जिसमें फ्रांसिस न्यूटन सूज़ा और एस एच रज़ा और एम एफ हुसैन जैसे कलाकार थे।  उन्होंने समूह की गतिविधियों में सक्रिय रूप से भाग लिया। उन्होंने भारत के साथ-साथ विदेशों में भी कई प्रदर्शनियां आयोजित कीं।
       1956 में, उन्होंने भारतीय कला प्रदर्शनी में भाग लिया, जो पूर्वी यूरोपीय देशों में आयोजित की गई थी। उन्होंने 1959 और 1963 में ग्रैहम आर्ट गैलरी, न्यूयॉर्क में आयोजित अन्य समूह प्रदर्शनियों में भी भाग लिया। गायतोंडे के अमूर्त कार्यों को कई भारतीय और विदेशी संग्रहों में शामिल किया गया है, जिनमें म्यूज़ियम ऑफ़ मॉडर्न आर्ट, न्यूयॉर्क शामिल हैं।
     1957 में, उन्हें यंग एशियन आर्टिस्ट्स प्रदर्शनी, टोक्यो में पहला पुरस्कार दिया गया और 1964 में रॉकफेलर फेलोशिप मिली। 1971 में, उन्हें भारत सरकार द्वारा पद्म श्री से सम्मानित किया गया था।

वे दिल्ली के निज़ामुद्दीन पूर्वी क्षेत्र में रहते थे, और 2001 में, अनजान कारणों से उनकी मृत्यु हो गई। 

Thursday, May 7, 2020

धनराज भगत


धनराज भगत
जन्म
1917
लाहौर, ब्रिटिश भारत

मृत्यु
1988

व्यवसाय
मूर्तिकला

पुरस्कार
पद्म श्री
ललित कला अकादमी पुरस्कार
दिल्ली साहित्य कला परिषद पुरस्कार
ललित कला अकादमी, कोलकाता स्वर्ण पदक
बॉम्बे आर्ट सोसाइटी अवार्ड

1917 में लाहौर में जन्मे धनराज भगत को उपमहाद्वीप के कला इतिहास में सबसे नवीन मूर्तिकारों में से एक माना जाता है। उन्होंने लाहौर के मेयो स्कूल ऑफ आर्ट से क्षेत्र में अपना डिप्लोमा प्राप्त किया, जिसके बाद उन्होंने 1947 से 1977 तक नई दिल्ली के कॉलेज ऑफ आर्ट में मूर्तिकला विभाग के प्रमुख के रूप में कार्य किया।


भगत ने अक्सर अपने काम में नए और असामान्य मीडिया के साथ प्रयोग किया। वह जिस अनोखे अंदाज में परफेक्ट थे वह अनोखी शैली उन्होंने पूरी की .. ।
उन्होंने वर्षों तक काम किया जो राष्ट्रीय विरासत और कलात्मक परंपराओं और पश्चिमी कलात्मक आदर्शों के प्रतिरूप को दर्शाता है, जो ज्यामितीय आकृतियों और रंग के उनके उपयोग में परिलक्षित होता है। कलाकार ने हर मीडिया में काम किया । लेकिन पसंदीदा माध्यम लकड़ी उन्हें और उनकी मूर्तियों को सबसे अच्छी लगती थी, जो उनके लिए महत्वपूर्ण कई सूक्ष्म रूपांकनों को उकेरने में सहायक होती और कृतियों को सम्पूर्ण रूप प्रदान करने में आसानी होती।। भगत की शैली और कार्य के रूप की तुलना अक्सर विक्टर वासिली और पॉल क्ले के कामों से की गई है। जिनके कृतियों में न्यूनतम ज्यामिति और सूक्ष्म आकार भी शामिल हैं। 
अपने जीवन के अंतिम वर्षों के दौरान, जब वह मूर्तिकला के प्रति बहुत कमजोर थे, भगत ने चित्र का एक पोर्टफोलियो तैयार किया, जिसने उनकी विशिष्ट कलात्मक शब्दावली को भी दर्शाया।

भगत के काम को कई प्रदर्शनियों में प्रदर्शित किया गया है, जिसमें ललित कला अकादमी, नई दिल्ली 1978 सबसे प्रमुख गैलरियों में से है। उन्होंने भारत के पहले तीन त्रैवार्षिक में भाग लिया है; 1954 में नई दिल्ली के नेशनल गैलरी ऑफ़ मॉडर्न आर्ट में अखिल भारतीय मूर्तिकला प्रदर्शनी; और बॉम्बे आर्ट सोसाइटी, मुंबई, अखिल भारतीय ललित कला अकादमी, कोलकाता और ऑल इंडिया फाइन आर्ट्स एंड क्राफ्ट्स सोसाइटी (एआईएफएसीएस), नई दिल्ली द्वारा आयोजित कई शो। अपने व्यापक करियर के दौरान, भगत को अपनी अग्रणी कला के लिए कई पुरस्कार मिले, जिसमें 1961 में ललित कला अकादमी, नई दिल्ली से राष्ट्रीय पुरस्कार और 1977 में भारत सरकार से पद्म श्री शामिल थे। भगत का 1988 में निधन हो गया।

Wednesday, May 6, 2020

कृष्ण खन्ना



कृष्ण खन्ना 


    कृष्ण खन्ना का जन्म लायलपुर में हुआ था, जिसे अब पाकिस्तान के फैसलाबाद के नाम से जाना जाता है। उन्होंने विंडसर, इंग्लैंड में इम्पीरियल सर्विस कॉलेज में भाग लिया और काफी हद तक एक खुद से सीखे हुये कलाकार है। प्रगतिशील समूह के सबसे अधिक प्रयासरत कलाकारों में से एक, खन्ना कथा और औपचारिक चिंताओं के बीच वैकल्पिक रूप से काम करते है। शैलीगत रूप से उनके कार्यों को पश्चिमी आधुनिकता के साथ जोड़ा जाता है, लेकिन उनके आसपास की दुनिया में होने वाली घटनाओं से प्रेरित है।

   लाहौर लौटने पर, उन्होंने शेख अहमद के अधीन प्रशिक्षुता व्यक्त की, जिसने कलाकार को जीवन से आकर्षित होने के लिए प्रोत्साहित किया। उनके शुरुआती कार्यों में विभिन्न बाइबिल के दृश्य शामिल हैं। विभाजन के समय कलाकार का परिवार भारत आ गया और खन्ना 1948 में बॉम्बे आ गए जहाँ उन्होंने बैंकिंग में करियर शुरू किया। वह बॉम्बे प्रोग्रेसिव आर्टिस्ट ग्रुप से परिचित हो गए और 50 के दशक के उनके विषयों में शहरी प्रवासी शामिल थे।

      1953 में, कलाकार मद्रास चले गए और कर्नाटक संगीत में बहुत रुचि थी जो उनके कार्यों में स्पष्ट है। 1961 में, 14 साल पूरे करने के बाद, खन्ना ने पूर्णकालिक कलाकार बनने के लिए ग्रिंडेयल्स बैंक में बैंकर के रूप में अपनी नौकरी से इस्तीफा दे दिया। एक रॉकफेलर फेलोशिप के साथ उन्होंने 1962 में जापान के लिए अपना रास्ता खोज लिया। वहां वह चीनी सुलेख, सूमी-ई और जापानी स्याही चित्रों के एक प्राचीन रूप के अभ्यास से प्रेरित थे और चावल के कागज पर स्याही के साथ काम करता है। 1964 में, वह नई दिल्ली लौट आए।

     1970 में बांग्लादेश युद्ध ने उन्हें ’द गेम’ शीर्षक से अत्यधिक राजनीतिक चित्रों की एक श्रृंखला बनाने के लिए प्रेरित किया। 80 के दशक में उनका सबसे लोकप्रिय आवर्ती विषय  'बैंडवाला' था जिसको खन्ना ने चित्रित किया जब वह नई दिल्ली में गढ़ी स्टूडियो में थे। यहां दैनिक जीवन से विषयों की वापसी हुई।

     खन्ना 1980 में एक प्रदर्शनी के लिए मसीह के विश्वासघात का चित्रण करके व्यक्तिगत पीड़ा के विषय पर लौट आए। खन्ना के कार्यों ने 1970 में भारत की सामाजिक आलोचना की व्याख्या की, उदाहरण के लिए उनकी दिव्यता के लिए उनकी मानवता दिखाने के लिए एक प्रभामंडल के बिना मसीह के चित्रण।

   भारतीय कला में उनके अपार योगदान को स्वीकार करते हुए, भारत सरकार ने उन्हें 2004 में भारत के राष्ट्रपति ललित कला रत्न, 1990 में पद्मश्री और 2011 में पद्म भूषण सहित कई सम्मानों से सम्मानित किया। खन्ना नई दिल्ली में रहते हैं और काम करते हैं।


सतीश गुजराल

सतीश गुजराल



सतीश गुजराल का जन्म 25 दिसम्बर, 1925 को ब्रिटिश इंडिया के झेलम (अब पाकिस्तान) में हुआ था। उन्होंने लाहौर स्थित मेयो स्कूल ऑफ आर्ट में पाँच वर्षों तक अन्य विषयों के साथ-साथ मृत्तिका शिल्प और ग्राफिक डिज़ायनिंग का अध्ययन किया। इसके पश्चात सन 1944 में वे बॉम्बे चले गए जहाँ उन्होंने प्रसिद्ध सर जे जे स्कूल ऑफ आर्ट में दाखिला लिया पर बीमारी के कारण सन 1947 में उन्हें पढ़ाई बीच में ही छोड़नी पड़ी। बचपन में इनका स्वास्थ्य काफ़ी अच्छा था। आठ साल की उम्र में पैर फिसलने के कारण इनकी टांगे टूट गई और सिर में काफी चोट आने के कारण इन्हें कम सुनाई पड़ने लगा। परिणाम स्वरूप लोग सतीश गुजराल को लंगड़ा, बहरा और गूंगा समझने लगे। सतीश चाहकर भी आगे की पढ़ाई नहीं कर पाए। ख़ाली समय बिताने के लिए चित्र बनाने लगे। इनकी भावना प्रधान चित्र देखते ही बनती थी। इनके अक्षर एवं रेखाचित्र दोनों ही ख़ूबसूरत थी।

पद्म विभूषण से सम्मानित और बहुमुखी प्रतिभा के धनी प्रसिद्ध भारतीय चित्रकार, मूर्तिकार, लेखक और वास्तुकार सतीश गुजराल का 94 साल की उम्र में निधन हो गया। वो भारत के पूर्व प्रधानमंत्री इंद्र कुमार गुजराल के छोटे भाई थे। भारत सरकार ने कला के क्षेत्र में उनके उत्कृष्ट योगदान के लिए सन 1999 में उन्हें पद्म विभूषण से सम्मानित किया था।  
1925 में लाहौर में जन्मे गुजराल ने विभाजन का दुख और भयावहता देखी। इसके बाद वह सिमला चले गए, जहां उन्होंने खुद को पेंटिंग में तल्लीन कर लिया। सतीश को कला का राष्ट्रीय पुरस्कार तीन बार प्राप्त हो चुका है।
दो बार चित्रकला के लिए एवं एक बार मूर्तिकला के लिए। इनका विवाह किरण गुजराल के साथ हुआ। इनका बेटा एक प्रसिद्ध वास्तुकार है। इनकी बड़ी बेटी अल्पना ज्वैलरी डिजाइनर है एवं छोटी बेटी रसील इंटीरियर डिजाइनर है। 
सतीश गुजराल ने कई पुरस्कार जीते। जिनमें  मेक्सिको का 'लियो नार्डो द विंसी' और बेल्जियम के राजा का 'आर्डर आफ क्राउन' पुरस्कार शामिल हैं। सतीश गुजराल के चित्रों में आकृतियाँ प्रधान हैं। पशु और पक्षियों को उनकी कला में सहज स्थान मिला। इतिहास, लोककथा, पुराण, प्राचीन भारतीय संस्कृति और विविध धर्मों के प्रसंगों को उन्होंने अपने चित्रों में उकेरा है।

गेडे

जन्म
19 अगस्त 1917
अमरावती, महाराष्ट्र, भारत
मृत्यु
16 दिसंबर 2001 (आयु 84 वर्ष)
राष्ट्रीयता
भारतीय
व्यवसाय
कलाकार



प्रारंभिक जीवन और शिक्षा
गेडे ने अपने करियर की शुरुआत वॉटरकलर लैंडस्केप्स से की । प्रोग्रेसिव आर्टिस्ट के रूप में, उनकी रचनाएँ औपनिवेशिक मूल्यों और शैलियों के एक विराम को दर्शाती हैं, जो औपनिवेशिक भारत में कला शिक्षा को प्रभावित करती थीं। 
 एक आलोचक ने उल्लेख किया है कि गेडे के कामों में, रंग का महत्व है, रूप केवल आकस्मिक है।" कुछ कृतियां 1950 के दशक में बनी जिनमें बंबई की मलिन बस्तियों और गरीबी को कलाकार ने चित्रित किया है। हालाँकि उन्होंने केरल और भारतीय मानसून से लेकर राजस्थान के  शुष्क परिदृश्य तक के बहु दृश्यों का एक विलक्षण और विविध चित्र तैयार किया।
गेडे का कला जीवन
गेडे की विज्ञान और गणित में रुचि थी और उन्होंने रोजर फ्राई द्वारा पेंटिंग तकनीकों और सौंदर्यशास्त्र पर कई काम किए। उनकी रचनाएं उनके ज्यामितीय रूप से संरचित परिदृश्यों में उनके वैज्ञानिक झुकाव को दर्शाती हैं जो क्यूबिस्टों के लिए भी विचारोत्तेजक हैं। उनके कुछ उल्लेखनीय कार्यों में कश्मीर, मंदिर, गदहे, सभ्यता और ओंकारेश्वर शामिल हैं।
 गेडे की पेंटिंग पैलेट चाकू और पेंटब्रश दोनों को रोजगार देती हैं । और उन्हें रंगों के दृश्य प्रभाव की उनकी जन्मजात प्रशंसा के कारण "चित्रकारों के चित्रकार" के रूप में संदर्भित किया गया है। 

गेड प्रोग्रेसिव आर्टिस्ट्स ग्रुप के छह संस्थापक सदस्यों में से एक थे। और 1956 में इसके विघटन तक इसका हिस्सा बने रहे। उनके कार्यों को द मॉडल्स में भारत और विदेश दोनों स्थानों पर विभिन्न स्थानों पर प्रदर्शित किया गया । नेशनल गैलरी में  प्रदर्शनी का उद्घाटन और विदेश के कुछ स्थानों में  जहां प्रदर्शनी आयोजित हुई स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रदर्शनी (1948), बेसल (1951, 1956) और वेनिस बिएनले (1954) शामिल हैं। 1950 के दशक के उत्तरार्ध में, उन्होंने बॉम्बे ग्रुप ऑफ़ आर्टिस्ट की स्थापना की, जिसके सदस्य के.के. हेब्बार और बाल छाबड़ा थे।

1956 में गेडे ने बॉम्बे आर्ट सोसाइटी का स्वर्ण पदक जीता। उन्हें महाराष्ट्र राज्य कला प्रदर्शनी और 1962 के साइगॉन बेनेले में भी मिला

अविनाश चंद्र


अविनाश चंद्र
अविनाश चंद्र (28 अगस्त 1931-15 सितंबर 1991) एक भारतीय चित्रकार थे, जो यूनाइटेड किंगडम में रहते थे और काम करते थे। 


जन्म-
28 अगस्त 1931
शिमला, भारत
मृत्यु-
15 सितंबर 1991 (आयु 60 वर्ष)
राष्ट्रीयता-
भारतीय
व्यवसाय-
चित्रकार
उनका जन्म 28 अगस्त 1931 को शिमला, भारत में हुआ था, और उनका पालन-पोषण दिल्ली में हुआ था। उनके पिता दिल्ली में सेसिल होटल के प्रबंधक थे। उन्होंने भाग लिया, और बाद में दिल्ली पॉलिटेक्निक में पढ़ाया गया।उनके छात्रों में परमजीत सिंह, अर्पिता सिंह और गोपी गजवानी शामिल हैं। उनका 1955 "पहलगाम में हिमपात" INR 4,375,000 में बिका।

वह अपनी पत्नी के साथ 1956 में गोल्डर्स ग्रीन, लंदन चले गए। 

1962 में उन्हें बीबीसी मॉनिटर डॉक्यूमेंट्री में चित्रित किया गया था, जिसे डब्ल्यू.जी. आर्चर द्वारा प्रस्तुत किया गया था।

15 सितंबर 1991 को उनका लंदन में निधन हो गया।

चंद्रा ने 1954 में नई दिल्ली में कला के प्रथम राष्ट्रीय कला प्रदर्शनी में प्रथम पुरस्कार जीता। और 1962 में स्वर्ण पदक प्रिक्स यूरोपियन। 

1965 में लंदन के हैमिल्टन गैलरी में एक एकल प्रदर्शनी आयोजित की गई थी। उनके काम को द अदर स्टोरी के रूप में भी प्रदर्शित किया गया। 1989 में हेवर्ड गैलरी में एफ्रो-एशियाई कलाकार; और ग्रेट ब्रिटेन की कला परिषद, केमोल संग्रहालय, कैटल के यार्ड  गैलेरीयो में उनके वर्क संग्रहित किये गए हैं।

फ्रांसिस न्यूटन सुज़ा

फ्रांसिस न्यूटन सूजा

जन्म
12 अप्रैल 1924
गोवा

मृत्यु
28 मार्च 2002 (आयु 77 वर्ष)
मुंबई

राष्ट्रीयता
भारतीय

के लिए जाना जाता है
चित्रकला रेखाचित्र

उल्लेखनीय कार्य
"शब्द और रेखाएं"

आंदोलन
प्रगतिशील कला

साथी
श्रीमति लाल

 सुजा का जन्म 1924 में गोवा में हुआ था प्रोग्रेसिव आर्टिस्ट ग्रुप के जनक सूजा हुसैन रजा व आरा के साथ भारतीय आधुनिक कला जगत में चमके। इस ग्रुप में जोश व हिम्मत दोनों थी  सूजा ने अनगिनत चित्र बनाये। सूजा का दिमाग कम्प्यूटर की तरह चलता था सूजा एक दिन मव कई चित्र बनाते थे । सूजा के अधिकांश काम एक्रेलिक से बने हैं। प्रभावशाली रेखांकन में समूची दुनिया ही समायी है। मसीह, सलीब, औरत, देवी -देवता, चेहरे आदि सभी कुछ सूजा रेखांकित करते हैं।

1947 में वे बॉम्बे प्रोग्रेसिव आर्टिस्ट्स ग्रुप के एक संस्थापक सदस्य थे, जिसने भारतीय कलाकारों को अंतर्राष्ट्रीय आर्ट इवेंट्स में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित किया।
1948 में लंदन के बर्लिंगटन हाउस में एक प्रदर्शनी में सूजा के चित्रों को भी प्रदर्शित किया गया। 1949 में सूजा लंदन चले गए, जहां शुरुआत में एक कलाकार के रूप में एक प्रभाव बनाने के लिए संघर्ष किया। उन्होंने एक पत्रकार के रूप में काम किया। समकालीन कला संस्थान ने 1954 की प्रदर्शनी में उनके काम को शामिल किया। एक कलाकार के रूप में उनकी सफलता को स्टीफन स्पेंडर की एनकाउंटर पत्रिका में उनके आत्मकथात्मक निबंध (निर्वाण ऑफ द मैगॉट)1955 में प्रकाशित किया। स्पेंडर ने सूजा को गैलरी के मालिक कला डीलर विक्टर मुसाग्रेव से मिलवाया। सूजा को 1955 में हुई प्रदर्शनी में पेंटिंग्स बिकने में जिससे सफलता मिली ।

1959 में सूजा ने शब्द और रेखाएँ प्रकाशित कीं। 

सूजा का कैरियर लगातार विकसित हुआ, और उन्होंने जॉन बर्जर से सकारात्मक समीक्षा प्राप्त करते हुए कई शो में भाग लिया। सुज़ा ने अभिव्यक्तिवादी, लेकिन रोमांटिकतावाद के तत्वों पर भी ड्राइंग करते थे।इतिहासकार यशोधरा डालमिया के अनुसार सुज़ा का काम अक्सर अत्यधिक कामुक होता था। उनकी ड्रॉइंग्स बोल्ड थीं।



सैयद हैदर रज़ा

सैयद हैदर रजा

 सैयद हैदर रजा का जन्म मध्य प्रदेश के ककैया नामक गांव में 1922 में हुआ था। वह कई वर्षों से पेरिस में रह रहे हैं। उन्होंने स्थाई रूप से फ्रांस की नागरिकता ग्रहण कर ली थी। रजा प्रोग्रेसिव आर्टिस्ट ग्रुप के जन्मदाता ओं में से एक थे। प्रारंभ में रजा की कला को देखकर उनके वाह्य अलंकरण उपादानो के प्रति मोह का पता चलता है। लेकिन जैसे-जैसे उनकी कला प्रौढ़ होती गई उनका यह मोह छूटता गया। रजा के रंग अंकन न भारतीय हैं ना ही ही ही फ्रांसीसी वे ऐसे रंग रंग हैं जिनके पास परंपरा की पूरी अर्थमय की छटा देखने को मिलती है।


सैयद हैदर रज़ा का जन्म मध्य प्रदेश के मंडला जिले में, जिले के उप वन अधिकारी सैयद मोहम्मद रज़ी और ताहिरा बेगम के घर हुआ था। तथा यही वह जगह थी जहां उन्होनें अपने जीवन के प्रारंभिक वर्ष गुज़ारे व 12 वर्ष की आयु में चित्रकला सीखी, जिसके बाद 13 वर्ष की आयु में मध्यप्रदेश के ही दमोह चले गए, जहां उन्होनें राजकीय उच्च विद्यालय, दमोह से अपनी स्कूली शिक्षा प्राप्त की। 

हाई स्कूल के बाद, उन्होनें नागपुर में नागपुर कला विद्यालय (1939-43), तथा उसके बाद सर जे.जे. कला विद्यालय, बम्बई (1943-47) से अपनी आगे की शिक्षा ग्रहण की।  जिसके बाद 1950-1953 की बीच फ़्रांस सरकार से छात्रवृति प्राप्त करने के बाद अक्टूबर 1950 में पेरिस के इकोल नेशनल सुपेरियर डे ब्यू आर्ट्स से शिक्षा ग्रहण करने के लिए फ़्रांस चले गए। पढ़ाई के बाद उन्होनें यूरोप भर में यात्रा की और पेरिस में रहे तथा अपने काम का प्रदर्शन जारी रखा। बाद में 1956 के दौरान उन्हें पेरिस में प्रिक्स डे ला क्रिटिक पुरस्कार से सम्मानित किया गया, जिसे प्राप्त करने वाले वह पहले गैर-फ़्रांसिसी कलाकार बने।

उन्होनें भारतीय युवाओं को कला में प्रोत्साहन देने के लिए भारत में रज़ा की फाउंडेशन स्थापना भी की है जो युवा कलाकारों को वार्षिक रज़ा फाउंडेशन पुरस्कार प्रदान करता है।

के एच आरा

 के एच आरा आरा


 आरा ने विशेष रूप विशेष रूप से प्रकृति से संबंधित चित्रों को बड़ी मौलिकता से मनाया है। इनकी कृतियां फल-फूल फारसी लघु चित्रों की याद दिलाते हैं। आरा की कला में इतनी सरलता है कि एक साधारण दर्शक भी उस का आनंद ले सकता है। पर वह कोई भोली-भाली कृति नहीं है। उनकी पूर्ण तकनीकी सैष्ठत है। उन्होंने अमूर्त चित्रण बहुत कम किया है, उनके अनावृत चित्रों में मांसलता तो है पर श्रंगारिकता नहीं है। आरा की कला में मातिस का प्रभाव स्पष्ट झलकता है। मराठा बैटल इन की प्रसिद्ध कृति है।

कृष्णजी हावलाजी आरा (16 अप्रैल 1914 - 30 जून 1985) एक भारतीय चित्रकार थे। उन्हें एक विषय के रूप में महिला नग्न का उपयोग करने वाले पहले समकालीन भारतीय चित्रकार के रूप में देखा जाता है।                  

       वह बॉम्बे में प्रोग्रेसिव आर्टिस्ट्स ग्रुप का हिस्सा थे और मुंबई में आर्टिस्ट्स सेंटर के संस्थापक थे। आरा के कार्यों के बारे में उनके आलोचक उन्हें  पूर्णता की कमी और जीवन से संदर्भित नहीं होने का आरोप लगाते हैं।  
      1942 में आरा ने बॉम्बे में चेतना रेस्तरां में अपने पहले एकल प्रदर्शनी की, जो एक सफल प्रदर्शनी साबित हुई ।  वह प्रगतिशील कलाकारों के समूह में शामिल हो गए, जिसमें 1948 में एम एफ हुसैन, एच ए गाडे, एस एच रजा, एफ एन सूजा और सदानंद बाकरे शामिल थे। समूह ने कला संग्रहालय, प्रिंस ऑफ वेल्स संग्रहालय के सामने कला घोड़ा में कलाकारों का केंद्र स्थापित किया। उन्होंने समूह के साथ कई शो किए, लेकिन सूजा, रजा, गादे और बाकरे के भारत छोड़ने के बाद, समूह पूर्ववत हो गया। 1948 से 1955 तक, आरा ने मुंबई, अहमदाबाद, बड़ौदा और कलकत्ता में कई एकल और समूह शो आयोजित किए और बाद में पूर्वी यूरोप, जापान, जर्मनी और रूस में एकल प्रदर्शन हुए। 1963 में उन्होंने मुंबई में अपनी 'ब्लैक न्यूड' श्रृंखला का प्रदर्शन किया और पोल आर्ट गैलरी में उद्घाटन शो का हिस्सा थे। कुमार गैलरी, नई दिल्ली ने 1955 और 1960 के बीच उनके काम का अधिग्रहण किया।
      आरा ने अपने करियर की शुरुआत सामाजिक-ऐतिहासिक विषयों पर परिदृश्य और चित्रों के साथ की लेकिन वह अपने अभी भी जीवन और नग्न चित्रों के लिए जाने जाते हैं। 

आरा ने अपने करियर की शुरुआत सामाजिक-ऐतिहासिक विषयों पर परिदृश्य और चित्रों के साथ की लेकिन वह अपने अभी भी जीवन और नग्न चित्रों के लिए जाने जाते हैं। 
आरा, ​​प्रकृतिवाद की सीमा के भीतर रहते हुए एक विषय के रूप में महिला नग्न पर ध्यान केंद्रित करने वाला पहले समकालीन भारतीय चित्रकार थे। उनके कई कार्य अभी भी जीवन और मानव आकृति के अध्ययन से संबंधित हैं। हालांकि उन्होंने शुरुआत में वाटर कलर और गॉच का इस्तेमाल किया, जहां उनके प्रभाव का उपयोग अक्सर उन्हें तेल चित्रों से मिलता-जुलता था, बाद में वे तेल के पेंट का उपयोग करने लगे। पतले रंगों की कृतियों के सफल निष्पादन उनके पानी के रंगों वाली शुरुआती पेंटिंग्स की याद दिलाती हैं जैसा कि पेंटिंग 'वूमन विद फ्लावर्स' में दिखाई देता है। आरा की चित्रकला में फ्रांसीसी आधुनिक कलाकारों, विशेष रूप से पॉल सेज़ान का गहरा प्रभाव परिलक्षित होता है।

आरा ने 1944 में पेंटिंग के लिए राज्यपाल पुरस्कार और 1952 में अपने कैनवास 'टू जुग्स' के लिए बॉम्बे आर्ट सोसाइटी से एक स्वर्ण पदक जीता।  उन्होंने विंडसर और न्यूटन नकद मूल्य, बॉम्बे भी जीता। 

Tuesday, May 5, 2020

एम एफ हुसैन


एम एफ हुसैन


जन्म
17 सितंबर 1915
पंढरपुर

मृत्यु
9 जून 2011, 2011
लंदन

मृत्यु का कारण
हृदयाघात

नागरिकता
भारत, क़तर, ब्रिटिश राज

व्यवसाय
फ़िल्म निर्देशक, राजनीतिज्ञ, कलाकार, पटकथा लेखक, फ़िल्म निर्माता, फोटोग्राफर

धार्मिक मान्यता
इस्लाम

बच्चे
शमशाद हुसैन

पुरस्कार

पद्म भूषण, कला में पद्मश्री श्री, पद्म विभूषण


समकालीन वरिष्ठ चित्रकार मकबूल फिदा हुसैन आधुनिक भारतीय चित्रकला के स्तंभ थे। हुसैन का जन्म सोलापुर महाराष्ट्र में 1915 में हुआ था।

एमएफ़ हुसैन को पहली बार राष्ट्रीय स्तर पर पहचान 1940 के दशक के आख़िर में मिली। वर्ष 1947 में वे प्रोग्रेसिव आर्टिस्ट ग्रुप में शामिल हुए। युवा पेंटर के रूप में एमएफ़ हुसैन बंगाल स्कूल ऑफ़ आर्ट्स की राष्ट्रवादी परंपरा को तोड़कर कुछ नया करना चाहते थे। वर्ष 1952 में उनकी पेंटिग्स की प्रदर्शनी ज़्यूरिख में लगी। उसके बाद तो यूरोप और अमरीका में उनकी पेंटिग्स की ज़ोर-शोर से चर्चा शुरू हो गई। वर्ष 1966 में भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किया। वर्ष 1967 में उन्होंने अपनी पहली फ़िल्म थ्रू द आइज़ ऑफ़ अ पेंटर बनाई। ये फ़िल्म बर्लिन फ़िल्म समारोह में दिखाई गई और फ़िल्म ने गोल्डन बेयर पुरस्कार जीता।
वर्ष 1971 में साओ पावलो समारोह में उन्हें पाबलो पिकासो के साथ विशेष निमंत्रण देकर बुलाया गया था। 1973 में उन्हें पद्मभूषण से सम्मानित किया गया तो वर्ष 1986 में उन्हें राज्यसभा में मनोनीत किया गया। भारत सरकार ने वर्ष 1991 में पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया। 92 वर्ष की उम्र में उन्हें केरल सरकार ने राजा रवि वर्मा पुरस्कार दिया। क्रिस्टीज़ ऑक्शन में उनकी एक पेंटिंग 20 लाख अमरीकी डॉलर में बिकी। इसके साथ ही वे भारत के सबसे महंगे पेंटर बन गए थे।

 प्रोग्रेसिव आर्टिस्ट ग्रुप के प्रणेता हुसैन ने सिनेमा होर्डिंग्स के पेंटर के रूप में कार्य किया।  और बाद में वह खुद फिल्मों फिल्मों का निर्माण करने लगे गज गामिनी और मीनाक्षी उनकी फिल्में है। हमेशा चर्चा और विवादों में बने रहने वाले हुसैन ने ललित कला अकादमी की प्रथम राष्ट्रीय प्रदर्शनी में पहला पुरस्कार प्राप्त किया। 1967 में "थ्रू द आईज ऑफ ऐ पेंटर" नामक वृत्तचित्र बनाया जो 1968 में बर्लिन में पुरस्कृत हुआ। भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री तथा पद्म भूषण भूषण से सम्मानित किया।
बुनियादी तौर पर हुसैन प्रतीक वादी चित्रकार थे। उनकी मानव आकृतियों में एक विशेष प्रकार की विकृति उत्पन्न की गई है। 1948 के लगभग वे यथार्थवादी रहे फिर धनवाद से संपूर्ण विकृत तक तक धीरे-धीरे पहुंच गए। उन्होंने श्रृंखलाओं में चित्रों को उतारा। उनकी प्रसिद्ध कृतियों में स्वास्तिक, ढोलकिया, घोड़े, वापसी, जमीन, मदर टेरेसा, फूलन देवी, मकड़ी, बैलगाड़ी आदि उल्लेखनीय हैं।


भारतीय देवी-देवताओं पर बनाई, इनकी विवादित पेंटिंग को लेकर भारत के कई हिस्सों में उग्र प्रदर्शन हुए। शिवसेना ने इसका सबसे अधिक विरोध किया।आर्य समाज ने भी इसका कड़ा विरोध किया और आर्य समाज के एक कार्यकर्ता और हैदराबाद के हिन्दी दैनिक स्वतंत्र वार्ता के पत्रकार तेजपाल सिंह धामा  भारत माता की विवादित पेंटिंग बनाने पर एम एफ हुसैन से एक पत्रकार वार्ता के दौरान उलझ बैठे थे, बाद में 2006 में हुसैन ने हिन्दुस्तान छोड़ दिया था।और तभी से लंदन में रह रहे थे। हुसैन से उलझने वाले पत्रकार धामा को बाद में मुंबई में एक कार्यक्रम में शिवसेना संस्थापक बाल ठाकरे द्वारा इन्हें सन आफ आर्यवर्त कहकर संबोधित किया। 2010 में कतर ने हुसैन के सामने नागरिकता का प्रस्ताव रखा, जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया। 2008 में भारत माता पर बनाई पेंटिंग्स के खिलाफ दिल्ली हाईकोर्ट में चल रहे मुकदमे पर न्यायाधीश की एक टिप्पणी "एक पेंटर को इस उम्र में घर में ही रहना चाहिए" जिससे उन्हें गहरा सदमा लगा और उन्होंने इसके खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय में अपील भी की। हालांकि इसे अस्वीकार कर दिया गया था।

के सी पणिक्कर


  केसी पणिक्कर 



जन्म
31 मई 1911
कोयंबटूर, तमिलनाडु
मृत्यु
16 जनवरी 1977 (65 वर्ष की आयु)
व्यवसाय
अमूर्त चित्रकार

पणिक्कर का जन्म 1911 में कोयंबटूर में हुआ। 1944 में पणिक्कर ने प्रोग्रेसिव पेंटर्स एसोसिएशन की शुरुआत की। उनकी कला में शब्दों, प्रतीकों, आधुनिकता, परंपरा का  अद्भुत संगम देखने को मिलता है। इनका कुछ कार्य तांत्रिक कलर से मिलता जुलता जुलता है। इनकी प्रसिद्ध कृतियां आदम और हव्वा, ईशा-बसंत, पीला चित्र, धन्य है शांतिदूत आदि उल्लेखनीय हैं आदि उल्लेखनीय हैं आदि उल्लेखनीय हैं।


1941 से, पनिकर चेन्नई और दिल्ली में एकल प्रदर्शनी आयोजित किया। उन्होंने 1944 में चेन्नई में प्रोग्रेसिव पेंटर्स एसोसिएशन (P.P.A) की स्थापना की। 1954 में उन्हें अपना पहला अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शन करने का मौका मिला जब उन्होंने लंदन और पेरिस में प्रदर्शनियाँ आयोजित कीं। वह 1957 में चेन्नई के गवर्नमेंट कॉलेज ऑफ़ फाइन आर्ट्स के प्रिंसिपल बने और 1966 में चेन्नई से 9 किमी दूर चोलमंडलम आर्टिस्ट्स विलेज का गठन किया, जिसमें उनके छात्र और कुछ साथी कलाकार थे।

विदेश में प्रदर्शनियों और सल्वाडोर डाली जैसे अमूर्त कलाकारों व उनकी प्रदर्शन का उनकी कला पर एक बड़ा प्रभाव था। वे अजीब, लेकिन आध्यात्मिक रूप से प्राचीन भारतीय चित्रकला और मूर्तिकला की अलौकिक अतिरंजना को बढ़ाते हैं ।

उन्होंने जिन रंगों का इस्तेमाल किया, वे चमकीले और चटक थे, जैसा कि प्रभाववादियों के चित्रों में रंग हैं। कहीं कहीं रेखाओं के नीचे, पणिक्कर ने सुलेख और प्रतीकों का उपयोग करने के लिए आध्यात्मिक रूप से अमूर्तता की स्थिति को आगे बढ़ाया।

केसीएस पनिकर का 16 जनवरी 1977 को 66 वर्ष की आयु में मद्रास में निधन हो गया।