Sunday, May 3, 2020

अमृता शेरगिल


अमृता शेरगिल
अमृता शेरगिल भारतीय कला को आधुनिकता की ओर मोड़ देने में अमृता शेरगिल ने शुरुआती मार्गदर्शन का महत्वपूर्ण काम किया। अतः उनको आधुनिक भारतीय कला के प्रणेताओं में स्थान दिया जाता है। रवींद्रनाथ की कला में वैचारिक जीवन की आध्यात्मिकता की अनुभूति है तो अमृता शेरगिल की कला में भारतीय सामान्य जीवन की  निष्काम समर्पितवृत्ति का दर्शन है। अमृता शेरगिल का जन्म 30 जनवरी 1913 में बुडापेस्ट हंगरी में हुआ। उनके पिता शेख व माता  हंगेरियन महिला थी। बाल्यावस्था में प्रथम 8 वर्ष उन्होंने यूरोप में बताएं और 1921 में उन्होंने पहली बार भारत का दर्शन किया। अंतर्राष्ट्रीय मिश्र विवाह का उनकी कला के विकास में अपरिमित लाभ हुआ। 

उनको अपने भारतीयता का उचित अभिमान था। माता के कारण उनका यूरोपीय संस्कृति व  कला से घनिष्ठ संपर्क रहा और आधुनिक कला का सत्य  ज्ञात करने में सफल हुए। अमृता की चित्रकला मैं अभिरुचि को देखकर माता ने उनको 1929 में पेरिस के  ए कॉल द बोजार मैं दाखिला कराया। वहां के 5 साल के कला अध्ययन से उन्होंने पाश्चात्य अंकन पद्धति पर दक्षता हासिल की। 3 साल तक उन्होंने लगातार  ए कॉल द बोजार के प्रथम पुरस्कार प्राप्त किए। 1932 में उनके चित्र  ग्रांद सलों में प्रदर्शित हुए। 1 साल के पश्चात वे उनके सदस्य चुने गए। केवल कला के अध्ययन से वे संतुष्ट नहीं थी। 1933 व 1934 में उन्होंने पैरिस के संग्रहालय कला वीथिका व प्रदर्शनी में प्राचीन कलाकृतियों एवं आधुनिक कलाकृतियों का परिशीलन किया। वे इस निष्कर्ष पर पहुंची की प्राचीन हो आधुनिक श्रेष्ठ कलाकृतियां उन्हें  अपरिवर्तनीय मूलाधार तत्वों पर आधारित होती हैं। उन्होंने अपने कला संबंधी विचारों को निम्न शब्दों में व्यक्त किया है, "श्रेष्ठ कला में चित्र क्षेत्रीय एवं रचनात्मक  सौंदर्य पर बल देकर केवल रूप के आवश्यक तत्व का विचार करके सरलीकरण किया जाता है"। भारत आते ही अमृता शेरगिल ने भारतीय जीवन का जो मुख्य मजदूरों ग्रामीण जीवन का निकट से आत्मीयता पूर्ण अध्ययन किया। भारतीय साधारण जन जीवन के उनके चित्र में पहाड़ी स्त्रियां भारतीय मां कहानी कथा बाल वधू बहुत ही प्रभावपूर्ण वह प्रसिद्ध हैं ।दक्षिण भारत की यात्रा करके उन्होंने वहां के साधारण लोगों के जीवन को चित्रित किया। इस समय उनके चित्र ब्रह्मचारी, वधू का श्रृंगार, फल बेचने वाले विशेष प्रसिद्ध है। दक्षिण भारत की यात्रा में उन्होंने अजंता को पहली बार देखा। उससे वो बहुत प्रभावित हुई, अजंता मुगल वसोहली शैलियों के अध्ययन में से अम्रता ने अपनी शैली के विकास में काफी लाभ उठाया, किंतु केवल भारतीय होने के कारण उनका अंधानुकरण करने का वे विरोध करती थीं। उन्होंने लिखा, "कम से कम एक कारण से मुझे प्रसन्नता है कि मैंने कलर की शिक्षा यूरोप में पाई, इसने ही मुझे अवसर दिया कि मैं अजंता, मुगल, राजपूत चित्रकारी को समझ सकूँ व उन्हें पसंद कर सकूं। होता यह है कि उसको समझने का अधिकांश भारतीय चित्रकार ढोंग तो करते हैं लेकिन वास्तव में वह गलत ढंग से समझी जाती है।
सराया प्रवास के दौरान उन्होंने अपने जीवन के कुछ महत्वपूर्ण पेंटिंग्स पर कार्य किया और ग्रामीण परिवेश का भी चित्रण किया। ‘विलेज सीन’, ‘इन द लेडीज एन्क्लोसर’ और ‘सिएस्टा’ आदि पेंटिंग्स इन विषयों को भली-भांति चित्रित करती हैं। ‘इन द लेडीज एन्क्लोसर’ और ‘सिएस्टा’ जैसी पेंटिंग्स उनके ‘मिनिएचर’ पद्धति को दर्शाती हैं जबकि ‘विलेज सीन’ पर पहाड़ी स्कूल का प्रभाव साफ़-साफ़ दीखता है।
हालाँकि कार्ल खंडालावाला और चार्ल्स फब्री जैसे कला समीक्षकों ने उन्हें 20वीं सदी का महानतम चित्रकार माना पर उनकी पेंटिंग्स को खरीदने वाले बहुत कम ही थे। उन्होंने अपनी पेंटिंग्स हैदराबाद के नवाब सलार जंग और मैसोर के महाराजा को भी दिखाया पर महाराज मैसोर ने उनके पेंटिंग्स के मुकाबले रवि वर्मा के पेंटिंग्स को पसंद किया।
हालाँकि अमृता शेरगिल का सम्बन्ध ब्रिटिश राज से था पर वे कांग्रेस की समर्थक थीं। वे गरीब, व्यथित और वंचित समाज से हमदर्दी रखती थी जो उनके कला में भी झलकता है। वे गांधीजी के दर्शन व जीवन शैली से भी बहुत प्रभावित थीं। पंडित नेहरु उनकी सुन्दरता और योग्यता के बहुत कायल थे और सन 1940 में गोरखपुर दौरे के दौरान वे अमृता से मिले भी थे।
  सितम्बर 1941 में अमृता लाहौर चली गयीं जो उस समय एक बड़ा सांस्कृतिक और कला केंद्र था। वे लाहौर में 23, गंगा राम मेन्शन, द मॉल, में रहती थीं।
व्यक्तिगत जीवन
      सन 1938 में उन्होंने अपने चचेरे भाई विक्टर एगन के साथ विवाह किया। ऐसा माना जाता है की अमृता शेरगिल कई पुरुषों और स्त्रियों से प्रेम-सम्बन्ध थे। इनमें से बहुत सी स्त्रियों के उन्होंने पेटिंग्स भी बनाई। ऐसा माना जाता है कि उनकी एक प्रसिद्द पेंटिंग ‘टू वीमेन’ में उनकी और उनकी प्रेमिका मारी लौइसे की पेंटिंग है।
   सन 1941 में अमृता शेरगिल बहुत बीमार हो गयीं और कोमा में चली गयीं। 6 दिसम्बर 1941 को उनकी मृत्यु लाहौर में हो गयी। उनकी मृत्यु का सही कारण तो आजतक नहीं पता चल पाया पर ऐसा माना जाता है कि असफल गर्भपात उनकी मृत्यु का कारण बना।

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