Friday, May 1, 2020

अवनींद्र नाथ टैगोर

अवनीन्द्रनाथ टैगोर
जन्म  -
07 अगस्त 1871
कलकत्ता बंगाल ब्रिटिश भारत
मृत्यु
5 दिसम्बर 1951 (उम्र 80) कलकत्ता
राष्ट्रीयता
भारतीय
प्रसिद्धि कारण
चित्रकला और लेखन


अवनींद्र नाथ टैगोर का प्रारंभिक कलाअध्ययन कोलकाता कला विद्यालय में यूरोपी में यूरोपी टेक्निक के अनुसार हुआ था और उससे वे असंतुष्ट थे । विचारों से प्रेरणा पाकर मुगल शैली का अनुसरण शुरू किया । छाया प्रकाश के स्थान पर उन्होंने बारीक वाह्यरेखा से अंकित आकारों को सपाट रंगों में में रंगों में में चित्रित किया ब्रिटिश शासन काल में विदेशी विचारधारा से प्रभावित सामाजिक वातावरण में किसी की भारतीय इतिहास या धर्म के प्रति वह श्रद्धा नहीं रही, ना कलाकारों में वह साधनावृत्ति थी। अतः अवनींद्र नाथ की कला परंपरावादी कर्मकांड मात्र मात्र होकर रह गई इसमें कोई आश्चर्य नहीं है।
1902 में जापानी कलाकार हिसिदा व ताईकॉन  कोलकाता आए थे जिसके परिणाम स्वरूप अवनींद्र नाथ ने जापानी शैली से कोमल रंग संगति को अपनाया व आकारों को सूचक रूप रूप में अस्पष्ट अंकित करना शुरू किया, जिससे भारतीय व जापानी शैलियों की सम्मिश्रित शैली विकसित हुई, जो बंगाल शैली या पुनरुत्थान शैली नाम से प्रसिद्ध हुई।
1905 में हैवेल के स्थान पर अवनींद्र नाथ को कोलकाता कला विद्यालय के आचार्य पद पर नियुक्त किया गया। उनके शिष्यों में प्रमुख रूप से नंदलाल बोस, देवी प्रसाद राय चौधरी, समरेंद्र नाथ गुप्ता, असित कुमार हलदर क्रमशः शांतिनिकेतन, मद्रास, लाहौर व लखनऊ के कला विद्यालयों के आचार्य पद पर नियुक्त हुए इससे पुनरुत्थान शैली का काफी प्रसार हुआ।
आधुनिक कला की दृष्टि से महत्वपूर्ण कलात्मक गुण (आकारों का सरलीकरण,रंगों के स्वाभाविक निर्मल सौंदर्य की रक्षा, प्रतीकात्मकता, प्रभावपूर्ण संयोजन इत्यादि) प्राचीन भारतीय कला शैली में प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं। किंतु इन गुणों का पुनरुत्थान शैली में अभाव था। डॉ. कुमार स्वामी ने पुनरुत्थान शैली की निर्मल रेखा का निस्तेज रंगों पर असंतोष व्यक्त किया । ओ सी गांगुली ने निष्कर्ष निकाला कि पुनरुत्थान शैली का जन्म बौद्धिक विचार व देशप्रेम में हुआ और उसमें स्वभाविकता व सहज ज्ञान नहीं है। आधुनिक गतिशील कार्य मैं व्यस्त व फैले हुए मानव जीवन में दृश्य कलाओं को प्रभावी बनाने के लिए शरलीकृत बड़े आकारों, स्पष्ट रेखा, चमकीले रंगों का प्रयोग आवश्यक है एवं मानव के विचारों व कार्यक्षेत्र के विश्वव्यापी रूप को देखते हुए सृजन के मूल तत्वों पर आधारित सर्वगामी कलानिर्मिति के प्रयत्न स्वाभाविक हैं।
किंतु विदेशी प्रभाव के बावजूद करा को अभिव्यक्ति का सामर्थ्य उसको परंपरा से ही प्राप्त होता है। हर देश की अपनी कला परंपरा होती है जो देश के निवासियों के जीवन दर्शन, आशा, आकांक्षा का दर्पण होती है। जिसमें देखकर कलाकार अपने आत्मिक स्वरूप से परिचित होता है और उसकी कला को सृजनात्मक दिशा प्राप्त होती है। इस विचार से बीसवीं शताब्दी के भारतीय कलाकारों को जरूरी था कि वे प्राचीन भारतीय कला परंपरा का अध्ययन करके अपने वास्तविक जीवन को रूपांकन पद्धति के नए आयामों द्वारा साकार करें। हेवेल व अवनींद्र नाथ ने भारतीय कला परंपरा के अध्ययन पर बल देकर उचित दिशा में कदम उठाया, किंतु भारतीय दर्शन को प्रभावी रूप में साकार करने का श्रेय रविंद्र नाथ टैगोर टैगोर को है। और उनको हम सर्वप्रथम भारतीय आधुनिक कलाकार मान सकते हैं। 1923 व 1928 के बीच के काल में अवनींद्र नाथ के भाई गोविंद नाथ ने धनवाद का अनुसरण करके कुछ कृतियां बनाईं, किंतु उनमें आकारों के घनवादी विभाजन के स्थान पर काल्पनिक दृश्यों को विषय प्रतिपादन की दृष्टि से परिणाम कारक बनाने हेतु मुख्य आकारों को यथार्थ रूप में चित्र करके ज्यामितीय कारण से व्यवस्थित किया अतः उनकी कला को 'घनवादी' की अपेक्षा रोमांचक यथार्थवादी कहना उचित है।
साहित्यकार:कई कलाओं में निपुण अबनिन्द्रनाथ टैगोर एक चित्रकार के साथ साथ  एक  प्रसिद्ध साहित्यकार भी थे. उन्होंने बंगला भाषा में बाल-साहित्य का सृजन भी किया था. उन्होंने बहुत सी पुस्तके लिखी जो काफी प्रसिद्ध कहानी 

संग्रह- 
क्षिरेर पुतुल,
बुरो अंगला,
राज कहानी
शकुंतला आदि  

महत्वपूर्ण रचनाएँ
अपन्कथा,
भुतापत्री,
घरोया,
जोरासंकोर धरे,
पथे विपथे,
नलका
नहुष आदि 

इस सब के साथ  उन्होंने कला दर्शन और सिद्धांत पर भी अपने कई लेखों को लिखा जिससे प्रभावित होकर कई  विद्वानों तथा कलाकारों से प्रशंसा मिली. और धीरे धीरे उनकी ख्याति देश ही विदेश तब फैलती गयी. और उनके प्रशंसकों की संख्या भी बढती गयी.

प्रमुख  चित्रकला
प्रवासी यक्'
शाहजहाँ की मृत्यु
बुद्ध और सुजाता
कच और देवयानी
उमर ख़य्याम आदि थे.

निधन:  
5 दिसम्बर, 1951 में उनका निधन हो गया था. उनके निधन के बाद  सबसे बड़े पुत्र तोपू धबल ने अपने पिता अबनिन्द्रनाथ टैगोर द्वारा बनाये गए सभी सभी चित्रों को रबिन्द्र भारती सोसाइटी ट्रस्ट के नाम कर दिया

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